Delhi News: देश की राजधानी दिल्ली में जमीन धंसने की समस्या तेजी से बढ़ती जा रही है।
Delhi News: देश की राजधानी दिल्ली में जमीन धंसने (Land Subsidence) की समस्या तेजी से बढ़ती जा रही है। एक नई अंतरराष्ट्रीय स्टडी ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि राजधानी के करीब 17 लाख लोगों की जिंदगी खतरे में है, क्योंकि यहां सैकड़ों इमारतें डेंजर जोन में पहुंच चुकी हैं। अगर समय रहते इस संकट से नहीं निपटा गया, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भी भयावह हो सकती है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

राजधानी में उभरता संकट
आपको बता दें कि देश की राजधानी दिल्ली में पर्यावरणीय समस्याओं के बीच जमीन धंसाव एक गंभीर संकट बनकर उभरा है। यदि शासन-प्रशासन और आमजन नहीं जागे तो व्यापक तबाही तय है। दिल्ली-NCR में भूमि धंसाव की गति बढ़ी है और महानगरों में दिल्ली इस मामले में तीसरे नंबर पर है। स्टडी के अनुसार, हजारों इमारतें खतरे में हैं और हालात सुधरे नहीं तो संकट का दायरा और फैलेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि 17 लाख लोग सीधे प्रभावित होंगे।
सबसे तेज धंस रही दिल्ली
नेचर जर्नल में प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय स्टडी से पता चला है कि दिल्ली अन्य भारतीय महानगरों की तुलना में सबसे तेज धंस रही है। यहां जमीन धंसने की अधिकतम दर 51 मिलीमीटर प्रति वर्ष तक पहुंच गई है। 2,264 इमारतें गंभीर संरचनात्मक जोखिम की श्रेणी में हैं और करीब 1.7 मिलियन लोग खतरे के दायरे में हैं। स्टडी ‘Building Damage Risk in Sinking Indian Megacities’ में मुख्य कारण भूजल का अत्यधिक दोहन बताया गया है, जिससे जलोढ़ मिट्टी संकुचित हो रही है।

ख़बरीमीडिया के Whatsapp ग्रुप को फौलो करें https://whatsapp.com/channel/0029VaBE9cCLNSa3k4cMfg25
तीसरे नंबर पर दिल्ली, मुंबई और कोलकाता से पीछे
स्टडी के मुताबिक, पांच भारतीय महानगरों दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु में से दिल्ली भू-धंसाव के मामले में तीसरे नंबर पर है। दिल्ली में 196.27 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रभावित है, जबकि मुंबई में यह 262.36 वर्ग किमी और कोलकाता में 222.91 वर्ग किमी तक फैला हुआ है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उपग्रह रडार (InSAR) डेटा से पता चला है कि एनसीआर के बिजवासन, फरीदाबाद और गाजियाबाद में क्रमशः 28.5 मिमी, 38.2 मिमी और 20.7 मिमी प्रति वर्ष की दर से जमीन धंस रही है। वहीं, दिल्ली के द्वारका क्षेत्र में कुछ जगहों पर जमीन 15.1 मिमी प्रति वर्ष की दर से ऊपर उठती भी पाई गई है।
अगले 30 साल में खतरा और बढ़ेगा
रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगले 30 वर्षों में दिल्ली में 3,169 इमारतें अत्यधिक जोखिम में होंगी, जो 50 साल बाद 11,457 तक पहुंच सकती हैं। मुंबई, चेन्नई और बेंगलुरु में भी इमारतों के धंसने की आशंका है। भारत में सतही जल और भूजल मानसून पर निर्भर हैं, लेकिन मानसून की अनियमितता और वर्षा पैटर्न में बदलाव से एक्विफर पर दबाव बढ़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि रोकथाम न हुई तो धंसाव की दर और तेज होगी।
ये भी पढ़ेंः ChatGPT: आज से ChatGPT की ये पेड सर्विस बिल्कुल फ्री
भूमि धंसाव की तीन प्रमुख वजहें
यह शोध कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के अर्थ सिस्टम साइंस, वर्जीनिया टेक के जियोसाइंस डिपार्टमेंट और कनाडा के रिचमंड हिल स्थित संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किया गया। 2015 से 2023 के InSAR डेटा का विश्लेषण किया गया।
- भूजल का अत्यधिक दोहन (Over-extraction of Groundwater)
दिल्ली में हर साल लाखों लीटर भूजल निकाला जा रहा है, जिससे भूमिगत जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। इस अनियंत्रित दोहन के कारण भूमिगत एक्विफर (Aquifer) खाली हो रहे हैं और जलोंढ़ मिट्टी (Alluvial Soil) सिकुड़ने लगी है। जब पानी की परतें खाली हो जाती हैं, तो मिट्टी के कण आपस में सघन होकर संकोचन (Compaction) पैदा करते हैं, जिससे जमीन धीरे-धीरे धंसने लगती है।
- मानसून की अनियमितता (Irregular Monsoon Patterns)
दिल्ली-एनसीआर में पिछले कुछ वर्षों से वर्षा का पैटर्न अस्थिर हो गया है। बारिश में देरी, अल्पवर्षा (कम वर्षा) और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाओं ने भूजल के प्राकृतिक पुनर्भरण (Groundwater Recharge) की प्रक्रिया को बुरी तरह प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप, भूमिगत जल भंडार भर नहीं पा रहे हैं और धंसाव की समस्या लगातार बढ़ रही है।
- जलवायु परिवर्तन (Climate Change)
बढ़ते तापमान और मौसम की चरम स्थितियों ने इस संकट को और गहरा दिया है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न असंतुलन के कारण भूमि धंसाव, बाढ़ और सूखा जैसी आपदाएं एक-दूसरे से जुड़कर एक ‘शहरी विनाश का चक्र’ (Urban Cycle of Destruction) बना रही हैं। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह स्थिति भविष्य में राजधानी की स्थिरता और सुरक्षा दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।
ये भी पढ़ेंः UPI: UPI से धड़ाधड़ पेमेंट करने वाले ये ज़रूरी ख़बर पढ़ लीजिए
जरूरी चेतावनी
रिसर्चर ने कहा कि पारंपरिक तरीकों से इमारतों की क्षति का आकलन मुश्किल है, क्योंकि हर दरार धंसाव का संकेत नहीं और दरार न होना सुरक्षा की गारंटी नहीं। सुझाव दिया गया कि भू-धंसाव और इमारत क्षति का समग्र डेटाबेस तैयार हो जिससे नीतिगत कदम समय पर उठें। निष्कर्ष में कहा गया कि जलवायु परिवर्तन, मौसम की चरम स्थितियां और भूमि धंसाव का संयुक्त प्रभाव भारत के शहरी ढांचे पर गंभीर खतरा है। इस चुनौती से निपटने के लिए तत्काल कदम जरूरी हैं।
