भारतीय लोकतंत्र में अक्सर यह माना जाता है कि जो नेता जितना लोकप्रिय है, वह संसद में भी उतना ही प्रभावी होगा। बड़ी चुनावी जीत, विशाल जनसभाएं, मीडिया में लगातार मौजूदगी और सोशल मीडिया पर लाखों समर्थक किसी नेता की मजबूत छवि जरूर बनाते हैं, लेकिन क्या यही चीजें उसे एक अच्छा सांसद भी बनाती हैं? संसदीय रिकॉर्ड पर नजर डालें तो जवाब हमेशा “हां” नहीं होता।
फेम इंडिया और एशिया पोस्ट के संयुक्त ‘सर्वश्रेष्ठ सांसद 2026’ सर्वेक्षण ने इसी धारणा की पड़ताल की है। इस अध्ययन में सांसदों का मूल्यांकन केवल उनकी राजनीतिक हैसियत, पार्टी में पद, लोकप्रियता या मीडिया कवरेज के आधार पर नहीं किया गया, बल्कि संसद में उनकी उपस्थिति, बहसों में भागीदारी, पूछे गए प्रश्न, प्राइवेट मेंबर बिल, संसदीय समितियों में योगदान, सांसद निधि के उपयोग और सामाजिक सरोकार जैसे मापनीय मानकों को भी शामिल किया गया।
लोकप्रियता और संसदीय प्रदर्शन में बड़ा अंतर
सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि कई चर्चित नेताओं का संसदीय प्रदर्शन उनकी सार्वजनिक छवि के अनुरूप नहीं रहा। संसद की औसत उपस्थिति लगभग 85 प्रतिशत रही, लेकिन कई बड़े नाम इस औसत से काफी पीछे रहे।
उदाहरण के तौर पर शत्रुघ्न सिन्हा की उपस्थिति करीब 64 प्रतिशत दर्ज की गई। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने किसी संसदीय बहस में भाग नहीं लिया और बहुत कम प्रश्न पूछे। सांसद निधि के उपयोग में भी उनका प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा। दिलचस्प बात यह है कि पिछले कार्यकाल में भी उनका रिकॉर्ड लगभग इसी तरह का था।
इसी तरह पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद की संसदीय सक्रियता भी औसत से कम रही। बिहार के सांसदों की औसत उपस्थिति लगभग 89 प्रतिशत रही, जबकि उनकी उपस्थिति करीब 76 प्रतिशत दर्ज हुई। प्रश्न पूछने के मामले में भी उनका प्रदर्शन कमजोर बताया गया।
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की उपस्थिति केवल 44 प्रतिशत रही, जबकि उत्तर प्रदेश के सांसदों की औसत उपस्थिति लगभग 92 प्रतिशत थी। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने बहसों और प्रश्नों में भी सीमित भागीदारी की तथा सांसद निधि के उपयोग और विकास कार्यों में अपेक्षित गति नहीं दिखाई।
सांसद निधि भी जवाबदेही का पैमाना
सांसदों को अपने क्षेत्र के विकास के लिए हर वर्ष 5 करोड़ रुपये की सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि (MPLADS) मिलती है। यह किसी सांसद की जवाबदेही का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय स्तर पर इस निधि का औसत उपयोग केवल 60 से 70 प्रतिशत के बीच रहता है। कई सांसद पूरी राशि खर्च नहीं कर पाते, कुछ मामलों में स्थानीय जरूरतों के बजाय राजनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर परियोजनाएं चुनी जाती हैं और कई बार समय पर प्रगति रिपोर्ट भी जमा नहीं होती। इसके विपरीत सक्रिय सांसद 90 प्रतिशत से अधिक निधि का प्रभावी उपयोग कर विकास कार्यों को गति देते हैं।
सेलिब्रिटी सांसदों की तस्वीर मिश्रित
फिल्म और खेल जगत से राजनीति में आने वाले सांसदों के प्रदर्शन पर भी सर्वेक्षण ने ध्यान दिया। पिछले वर्षों में सनी देओल, मिमी चक्रवर्ती और अभिनेता देव जैसे कई सेलिब्रिटी सांसदों की उपस्थिति और संसदीय सक्रियता राष्ट्रीय औसत से कम रही थी।
हालांकि रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि सभी सेलिब्रिटी सांसदों को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता।
मनोज तिवारी, रवि किशन और लॉकेट चटर्जी ने प्रश्न पूछने के मामले में उल्लेखनीय सक्रियता दिखाई। हालांकि रवि किशन की उपस्थिति अपेक्षाकृत कम रही। वहीं अरुण गोविल ने 95 प्रतिशत से अधिक उपस्थिति, कई बहसों में भागीदारी और बड़ी संख्या में प्रश्न पूछकर यह साबित किया कि लोकप्रियता और संसदीय गंभीरता साथ-साथ चल सकती है।
कम चर्चित सांसदों ने किया बेहतर प्रदर्शन
सर्वेक्षण का सबसे उल्लेखनीय पहलू उन सांसदों का प्रदर्शन रहा, जो मीडिया की सुर्खियों में कम दिखाई देते हैं, लेकिन संसद में बेहद सक्रिय हैं।
भर्तृहरि महताब, सुप्रिया सुले, जगदंबिका पाल, निशिकांत दुबे और एन. के. प्रेमचंद्रन उपस्थिति, बहस, प्रश्न और संसदीय योगदान के आधार पर शीर्ष प्रदर्शन करने वाले सांसदों में शामिल रहे।
जगदंबिका पाल ने 100 प्रतिशत उपस्थिति दर्ज कराई और बड़ी संख्या में बहसों व प्रश्नों के माध्यम से संसदीय सक्रियता का उदाहरण पेश किया। वहीं सुप्रिया सुले और भर्तृहरि महताब ने भी लगातार सक्रिय रहकर प्रभावी संसदीय भागीदारी दिखाई।
बड़े नेताओं का प्रदर्शन कमजोर क्यों पड़ता है?
रिपोर्ट के अनुसार इसके पीछे कई व्यावहारिक और राजनीतिक कारण हैं। राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेताओं की जिम्मेदारी केवल संसद तक सीमित नहीं रहती। वे पार्टी संगठन, चुनाव प्रचार, रणनीति, मीडिया कार्यक्रमों और अन्य राजनीतिक गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं।
ऐसे में संसद की नियमित कार्यवाही, प्रश्न पूछना और स्थानीय विकास से जुड़े कार्य कई बार उनकी प्राथमिकताओं में पीछे चले जाते हैं। कुछ वरिष्ठ नेता यह भी मानते हैं कि तकनीकी विषयों पर प्रश्न पूछने और विस्तृत बहसों में भाग लेने की जिम्मेदारी उनके सहयोगियों या विशेषज्ञों की हो सकती है।
दूसरी ओर, अपेक्षाकृत कम चर्चित सांसद संसद को अपनी पहचान बनाने का सबसे बड़ा मंच मानते हैं। इसलिए वे नियमित उपस्थिति, प्रभावी प्रश्न, गंभीर बहस और क्षेत्रीय विकास पर अधिक ध्यान देते हैं।
केवल उपस्थिति ही अंतिम पैमाना नहीं
रिपोर्ट यह भी स्वीकार करती है कि किसी सांसद का मूल्यांकन केवल उपस्थिति या प्रश्नों की संख्या से नहीं किया जा सकता। कई सांसद संसदीय समितियों, नीति निर्माण, क्षेत्रीय विकास और जनसंपर्क के माध्यम से भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
फिर भी संसद लोकतांत्रिक जवाबदेही का सबसे महत्वपूर्ण मंच है। यदि कोई सांसद लगातार अनुपस्थित रहता है, बहसों में हिस्सा नहीं लेता, प्रश्न नहीं पूछता और विकास निधि का प्रभावी उपयोग भी नहीं करता, तो उसकी संवैधानिक भूमिका अधूरी मानी जा सकती है।
लोकतंत्र के लिए क्या है संदेश?
हाल के वर्षों में संसदीय सत्रों का समय कई कारणों से प्रभावित हुआ है। ऐसे में प्रश्नकाल और बहस के लिए उपलब्ध सीमित समय का महत्व और बढ़ जाता है। जो सांसद इन अवसरों का उपयोग नहीं कर पाते, वे अपने मतदाताओं की आवाज संसद में प्रभावी ढंग से नहीं उठा पाते।
‘सर्वश्रेष्ठ सांसद 2026’ सर्वेक्षण का सबसे बड़ा संदेश यही है कि लोकतंत्र में लोकप्रियता और संसदीय प्रदर्शन हमेशा एक-दूसरे के पर्याय नहीं होते। मतदाताओं को चुनावी भाषणों, प्रचार अभियानों और मीडिया की सुर्खियों के साथ-साथ अपने प्रतिनिधियों की संसदीय उपस्थिति, बहसों में भागीदारी, पूछे गए प्रश्न, समितियों में योगदान और सांसद निधि के उपयोग जैसे ठोस मानकों पर भी ध्यान देना चाहिए।
भर्तृहरि महताब, सुप्रिया सुले, जगदंबिका पाल, निशिकांत दुबे, एन. के. प्रेमचंद्रन, मनोज तिवारी, अरुण गोविल और अनुराग ठाकुर जैसे सांसद यह दिखाते हैं कि तैयारी, निरंतर भागीदारी और जवाबदेही के दम पर संसद में मजबूत पहचान बनाई जा सकती है। अंततः चुनाव जीतना किसी नेता को संसद तक पहुंचा सकता है, लेकिन इतिहास में वही सांसद याद रखे जाते हैं जो संसद के भीतर जनता की आवाज बनते हैं और संसद के बाहर विकास के जरिए अपने क्षेत्र में वास्तविक बदलाव लाते हैं।
