Delhi News:लोकप्रियता बनाम प्रदर्शन: बड़े नेताओं की संसदीय सक्रियता पर उठे सवाल, सर्वे में कई चौंकाने वाले खुलासे

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Delhi News: नई दिल्ली। चुनावी लोकप्रियता और संसदीय प्रदर्शन हमेशा एक जैसे नहीं होते। यही तस्वीर फेम इंडिया और एशिया पोस्ट के संयुक्त ‘सर्वश्रेष्ठ सांसद 2026’ सर्वेक्षण में सामने आई है। अध्ययन में सांसदों का मूल्यांकन केवल उनकी राजनीतिक लोकप्रियता या चुनावी जीत के आधार पर नहीं, बल्कि संसद में उपस्थिति, बहसों में भागीदारी, पूछे गए प्रश्न, प्राइवेट मेंबर बिल, संसदीय समितियों में योगदान, सांसद निधि के उपयोग और सामाजिक सरोकार जैसे मापनीय मानकों के आधार पर किया गया।

कई बड़े नेता संसदीय प्रदर्शन में पिछड़े

सर्वेक्षण के अनुसार संसद की औसत उपस्थिति करीब 85 प्रतिशत रही, लेकिन कई चर्चित नेता इससे काफी पीछे रहे। तृणमूल कांग्रेस के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा की उपस्थिति लगभग 64 प्रतिशत दर्ज की गई। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने किसी संसदीय बहस में भाग नहीं लिया और बहुत कम प्रश्न पूछे।

वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद की उपस्थिति भी बिहार के औसत से कम रही। इसी तरह समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की संसदीय उपस्थिति लगभग 44 प्रतिशत दर्ज हुई, जबकि उत्तर प्रदेश के सांसदों की औसत उपस्थिति इससे कहीं अधिक रही।

सांसद निधि के उपयोग में भी दिखा अंतर

रिपोर्ट में सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास निधि (MPLADS) के उपयोग को भी महत्वपूर्ण पैमाना माना गया। अध्ययन के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर इस निधि का औसत उपयोग लगभग 60 से 70 प्रतिशत के बीच रहता है। कई सांसद उपलब्ध राशि का पूरा उपयोग नहीं कर पाते, जबकि सक्रिय सांसद 90 प्रतिशत से अधिक राशि खर्च कर विकास कार्यों को गति देते हैं।

सेलिब्रिटी सांसदों का मिला-जुला प्रदर्शन

सर्वे में फिल्म और खेल जगत से राजनीति में आए सांसदों के प्रदर्शन का भी विश्लेषण किया गया। पिछले कार्यकालों के संदर्भ में सनी देओल, मिमी चक्रवर्ती और देव जैसे सांसदों की सीमित संसदीय सक्रियता का उल्लेख किया गया।

हालांकि सभी सेलिब्रिटी सांसदों का प्रदर्शन एक जैसा नहीं रहा। मनोज तिवारी, रवि किशन और लॉकेट चटर्जी ने प्रश्न पूछने में सक्रियता दिखाई, जबकि अरुण गोविल ने 95 प्रतिशत से अधिक उपस्थिति, कई बहसों में भागीदारी और बड़ी संख्या में प्रश्न पूछकर बेहतर संसदीय प्रदर्शन का उदाहरण पेश किया।

कम चर्चित सांसदों ने बनाई मजबूत पहचान

सर्वेक्षण में भर्तृहरि महताब, सुप्रिया सुले, जगदंबिका पाल, निशिकांत दुबे और एन. के. प्रेमचंद्रन जैसे सांसद संसदीय सक्रियता के आधार पर शीर्ष स्थानों पर रहे। विशेष रूप से जगदंबिका पाल ने शत-प्रतिशत उपस्थिति दर्ज कराई और बहसों व प्रश्नों के माध्यम से प्रभावी भागीदारी निभाई।

लोकप्रियता से ज्यादा जरूरी संसदीय जवाबदेही

सर्वेक्षण का निष्कर्ष है कि किसी सांसद की वास्तविक पहचान केवल चुनावी लोकप्रियता से नहीं, बल्कि संसद में उसकी सक्रियता और जनता के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने से बनती है। रिपोर्ट में मतदाताओं से अपील की गई है कि वे अपने जनप्रतिनिधियों का मूल्यांकन केवल चुनावी भाषणों या प्रचार अभियानों के आधार पर नहीं, बल्कि उनके संसदीय रिकॉर्ड, उपस्थिति, बहसों में भागीदारी, पूछे गए प्रश्नों और विकास कार्यों के आधार पर भी करें।