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Bihar News: गया, नवादा और जहानाबाद के किसानों की जीवनरेखा बनी ढाढ़र सिंचाई परियोजना, लाखों एकड़ खेतों को मिला पानी

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Bihar News: बिहार के गया, नवादा और जहानाबाद जिलों के किसानों के लिए ढाढ़र सिंचाई परियोजना किसी जीवनरेखा से कम नहीं है। वर्षों तक पानी की कमी और सूखे की मार झेलने वाले किसानों को अब खेतों की सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिल रहा है। वर्ष 2020 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा उद्घाटित इस परियोजना ने दक्षिण बिहार के कृषि क्षेत्र में नई उम्मीद जगाई है।

गया जिले के फतेहपुर प्रखंड के सोहजना दोनैया में बने बैराज के माध्यम से यह परियोजना हजारों किसानों के खेतों तक पानी पहुंचा रही है। इससे न केवल खेती आसान हुई है, बल्कि किसानों की आय और उत्पादन क्षमता में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है।

कैसे काम करती है ढाढ़र सिंचाई परियोजना?

गया जिले के फतेहपुर क्षेत्र में ढाढ़र नदी पर बने बैराज के जरिए पानी को नहरों और उनकी शाखाओं के माध्यम से खेतों तक पहुंचाया जाता है। मानसून के दौरान नदियों में आने वाले जल को संरक्षित कर सिंचाई नेटवर्क के जरिए किसानों तक पहुंचाया जाता है।

तिलैया जलाशय से ढाढ़र नदी तक पानी लाने की मूल योजना के तहत लगभग 1.40 लाख एकड़ फीट पानी उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया था। इससे गया और नवादा जिले के करीब 31,700 हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई सुविधा मिलनी थी।

किसानों के लिए वरदान साबित हुई परियोजना

करीब 300 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस परियोजना को क्षेत्र के किसान वरदान मानते हैं। पहले जहां सिंचाई के लिए पूरी तरह बारिश या भूजल पर निर्भर रहना पड़ता था, वहीं अब नहरों के माध्यम से खेतों तक पानी पहुंच रहा है।

वर्तमान में ढाढ़र नदी के जल से लगभग 6,900 हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की सिंचाई की जा रही है। सरकार का लक्ष्य शेष 24,800 हेक्टेयर क्षेत्र तक भी सिंचाई सुविधा का विस्तार करना है।

60 के दशक में शुरू हुआ था सपना

ढाढ़र परियोजना की कहानी लगभग छह दशक पुरानी है। वर्ष 1964 में तत्कालीन सांसद सत्यभामा देवी ने दक्षिण बिहार के सूखाग्रस्त इलाकों के लिए एक बड़ी सिंचाई योजना की जरूरत को महसूस किया। उनके प्रयासों के बाद इस महत्वाकांक्षी परियोजना की रूपरेखा तैयार की गई।

1974 में परियोजना को अंतिम रूप दिया गया और इसके लिए 13 करोड़ 43 लाख रुपये की प्रारंभिक स्वीकृति दी गई। वर्ष 1984 में तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह ने ढाढ़र सिंचाई परियोजना का शिलान्यास किया था।

झारखंड गठन के बाद अटक गई योजना

परियोजना की सबसे बड़ी चुनौती बिहार-झारखंड विभाजन के बाद सामने आई। तिलैया जलाशय झारखंड में चला गया और वहां से पानी मिलने की व्यवस्था प्रभावित हो गई। इसके कारण परियोजना वर्षों तक अधर में लटकी रही।

किसानों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न संगठनों ने इस परियोजना को पुनर्जीवित करने के लिए लगातार आंदोलन किए। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और बाद में इसे नौवीं पंचवर्षीय योजना में शामिल कर अतिरिक्त वित्तीय सहायता प्रदान की गई।

खरीफ फसलों को मिल रहा बड़ा लाभ

वर्तमान में खरीफ मौसम के दौरान सोहजना दोनैया बैराज से लगभग 739 क्यूसेक पानी छोड़ा जाता है। यह पानी नहरों और उनकी शाखाओं के माध्यम से खेतों तक पहुंचता है।

इससे धान समेत अन्य खरीफ फसलों की खेती करने वाले किसानों को काफी राहत मिलती है। सिंचाई लागत कम होने के साथ-साथ फसल उत्पादन में भी वृद्धि दर्ज की जा रही है।

बिजली उत्पादन की भी योजना

ढाढ़र सिंचाई परियोजना केवल सिंचाई तक सीमित नहीं है। इसके साथ 60 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है। यदि यह योजना पूरी तरह लागू होती है तो क्षेत्र को ऊर्जा के क्षेत्र में भी बड़ा लाभ मिलेगा।

कृषि विकास की नई उम्मीद

विशेषज्ञों का मानना है कि ढाढ़र सिंचाई परियोजना दक्षिण बिहार की कृषि व्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। पानी की बेहतर उपलब्धता से खेती का रकबा बढ़ेगा, उत्पादन में सुधार होगा और किसानों की आय में वृद्धि होगी।

गया, नवादा और जहानाबाद के लाखों किसानों के लिए यह परियोजना सिर्फ एक सिंचाई योजना नहीं, बल्कि कृषि समृद्धि और आर्थिक मजबूती की नई उम्मीद बनकर उभरी है। आने वाले वर्षों में यदि शेष क्षेत्र तक भी पानी पहुंचाने की योजना सफल होती है तो यह परियोजना बिहार की सबसे प्रभावी सिंचाई योजनाओं में शामिल हो सकती है।