Bihar Election: बिहार विधानसभा चुनाव में पीएम मोदी और सीएम नीतीश की जोड़ी ने सियासी समीकरण पूरी तरह उलट-पलट कर रख दिए।
Bihar Election: बिहार विधानसभा चुनाव में पीएम नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) और सीएम नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) की जोड़ी ने सियासी समीकरण पूरी तरह उलट-पलट कर रख दिए। NDA ने दो तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में धमाकेदार वापसी की है, जबकि महागठबंधन बुरी तरह हार गया। 243 सीटों में NDA को 190 से ज्यादा सीटें मिल रही हैं, वहीं महागठबंधन 50 से कम पर सिमट गया। वहीं, BJP ने JDU से आगे निकलकर शानदार प्रदर्शन किया। ये नीतीश कुमार की जीत है, जिन्होंने बिहार के वोटरों की पूरी सहानुभूति हासिल की और सत्ता समर्थक लहर को मजबूत बनाया। पढ़िए पूरी खबर…

उम्र और सेहत पर उठे सवाल बेअसर
आपको बता दें कि चुनाव से पहले विपक्ष के कई नेताओं ने सीएम नीतीश कुमार की बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य को मुद्दा बनाने की कोशिश की गई थी। लेकिन इसी सीएम नीतीश कुमार ने मैदान में उतरकर चुनावी समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया। 75 वर्ष की उम्र में उनकी सक्रियता और ऊर्जा ने बिहार की सियासत में विपक्ष के सभी दांवों को विफल कर दिया। साल 2015 की तरह इस बार भी नीतीश कुमार के प्रति सहानुभूति लहर दिखाई दी। सबसे अहम बात महागठबंधन के साथ जाने पर नीतीश कुमार की माफी को न सिर्फ बीजेपी नेतृत्व ने स्वीकार किया बल्कि जनता ने भी उनको पूर्ण भरोसा दिया।
सीएम नीतीश की माफी को मोदी-शाह और बिहार की जनता ने कबूल कर लिया। उन्होंने महागठबंधन के साथ जाने की ‘दो गलतियों’ पर माफी मांगी और वादा किया कि अब कहीं नहीं जाएंगे। PM मोदी के नेतृत्व में NDA की एकजुटता ने ये भरोसा कायम रखा।
सीएम नीतीश की व्यक्तिगत छवि
लगभग 20 साल के राजनीतिक नेतृत्व के बावजूद बिहार में सीएम नीतीश कुमार पर मतदाताओं का विश्वास मजबूत बना हुआ है। इतने लंबे कार्यकाल के दौरान उन पर किसी भी तरह के भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे हैं। इसके अलावा, राजनीतिक दलों में आमतौर पर दिखाई देने वाले परिवारवाद के आरोपों से भी सीएम नीतीश कुमार सुरक्षित रहे हैं। शराबबंदी, महिलाओं के लिए रोजगार योजनाओं और अन्य विकास कार्यक्रमों ने उनकी सकारात्मक छवि को और अधिक सुदृढ़ किया है।

कैश ट्रांसफर योजना ने बदली चुनावी तस्वीर
चुनाव से ठीक पहले बिहार सरकार द्वारा 75 लाख महिलाओं के खातों में 10–10 हजार रुपये की सीधी सहायता भेजी गई थी, जिसे बाद में बढ़ाकर एक करोड़ से अधिक महिलाओं तक पहुंचाया गया। इस योजना को दिल्ली से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉन्च किया था। एनडीए के लिए यह कदम निर्णायक साबित हुआ।
महागठबंधन ने इस ट्रांसफर को लोन या अनुदान बताने का नैरेटिव बनाने की कोशिश की, लेकिन इसका असर दिखाई नहीं दिया। विपक्ष के नेता ने जीविका दीदियों के लिए वेतन बढ़ाने और सरकारी नौकरी जैसी बड़ी घोषणाएं कीं, फिर भी मतदाताओं ने वादों से अधिक वास्तविक लाभ को महत्व दिया।
महिला रोजगार योजना के तहत 1.51 करोड़ महिलाओं को सीधा फायदा मिला और बिहार देश का पहला राज्य बन गया जहां 31 लाख से अधिक जीविका दीदियां लखपति हैं। महिलाओं का यह मजबूत समर्थन नीतीश कुमार के लिए निर्णायक रहा।
शराबबंदी पर जनता ने एक बार फिर भरोसा दिखाया
2015 में किए गए वादे के बाद सीएम नीतीश कुमार ने सत्ता में लौटकर पूर्ण शराबबंदी लागू की। आलोचनाएं हुईं, अदालतों में मामलों की संख्या बढ़ने पर भी सवाल उठे, लेकिन नीतीश ने इससे पीछे हटने से इनकार कर दिया। विपक्ष समीक्षा की बात कर रहा था और प्रशांत किशोर शराबबंदी हटाने की घोषणा कर चुके थे। लेकिन जनादेश साफ बताता है कि बिहार की महिलाएं और बड़ी संख्या में मतदाता शराबबंदी के साथ मजबूती से खड़े हैं।
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‘ब्रांड नीतीश’ पर वोटरों का अटूट भरोसा
2005 से ‘सुशासन बाबू’ की पहचान पाने वाले सीएम नीतीश कुमार की साख इस चुनाव में भी कायम रही। बिजली, सड़क, शिक्षा और कानून-व्यवस्था सुधारों की बदौलत लोगों का भरोसा एनडीए के पक्ष में रहा। लेकिन अपराध की कुछ घटनाओं पर सवाल उठे, लेकिन बीजेपी और जेडीयू ने ‘जंगलराज’ की याद दिलाकर विपक्ष के नैरेटिव को बेअसर कर दिया।
महिला वोटरों का अहम और निर्णायक रोल
नीतीश सरकार की वर्षों पुरानी योजनाएं साइकिल योजना, छात्राओं को प्रोत्साहन राशि, पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण, आशा कार्यकर्ताओं को दी गई सुविधाएं ने महिला मतदाताओं के बीच गहरी पकड़ बनाई। विपक्ष द्वारा किए गए वादों की तुलना में नीतीश की ‘डिलीवरी आधारित राजनीति’ अधिक प्रभावशाली साबित हुई।
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नीतीश को सहानुभूति और सम्मान दोनों मिले
पिछले तीन वर्षों से विपक्ष के नेता लगातार सीएम नीतीश कुमार पर हमलावर थे। स्वास्थ्य और उम्र को लेकर विपक्ष ने कठोर आरोप लगाए। लेकिन सीएम नीतीश कुमार ने 90 से अधिक जनसभाएं कीं, खराब मौसम में सड़क मार्ग से हजार किलोमीटर की यात्रा की और अंत तक सक्रिय रहे। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया वे न ‘टायर्ड’ हैं, न ‘रिटायर्ड’। जनता की प्रतिक्रिया भी इसी के अनुरूप रही ‘टाइगर अभी ज़िंदा है।’

सोशल इंजीनियरिंग में नीतीश-मोदी रणनीति हुई कारगर
इस बार एनडीए ने 2020 की तरह किसी भी बड़े विभाजन से बचते हुए पूरी एकजुटता बनाए रखी। चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा को साथ लेकर व्यापक सामाजिक समीकरण साधे गए। अति-पिछड़ा वर्ग का बड़ा हिस्सा एनडीए के साथ मजबूती से जुड़ा रहा। दूसरी ओर, महागठबंधन यादव-मुस्लिम वोट आधार से आगे विस्तार नहीं कर सका।
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बिहार की सत्ता का केंद्र फिर बने नीतीश कुमार
2005 से बिहार की राजनीति का केंद्र नीतीश कुमार ही रहे हैं। इस बार के चुनाव परिणाम यह साबित करते हैं कि वह सिर्फ किंगमेकर नहीं, बल्कि बिहार के असली किंग हैं। उनकी बढ़ी हुई सीटें दर्शाती हैं कि अब उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाना लगभग नामुमकिन है। पीएम मोदी- सीएम नीतीश की जोड़ी पर बिहार का भरोसा अटल बना हुआ है और डबल इंजन वाली सरकार फिर से बनने जा रही है।
