Jharkhand

स्मार्टफोन की चमकीली दुनिया और बेबस होते माता-पिता

झारखंड
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लेखक:
नितिन कुलकर्णी, IAS
अपर मुख्य सचिव, राज्यपाल, झारखंड

रात के एक या दो बजे का समय है। पूरा घर गहरी नींद में डूबा हुआ है। लेकिन एक कमरे के दरवाजे के नीचे से मोबाइल की हल्की नीली रोशनी बाहर झलक रही है। आधी रात को मां की आंख खुलती है। वह पानी पीने के लिए उठती है और सहज ही अपने बच्चे के कमरे में झांकती है। सामने उसका बेटा या बेटी बिस्तर पर बैठा है। हाथ में मोबाइल है, कानों में हेडफोन हैं और स्क्रीन पर कोई गेम, कोई वीडियो या सोशल मीडिया की अंतहीन दुनिया चल रही है। समय का एहसास जैसे पूरी तरह खत्म हो चुका है।

“तुम अभी तक सोए नहीं?” मां की चिंता से भरी आवाज कमरे में गूंजती है।

जवाब भी लगभग हर घर में एक जैसा होता है—”बस मम्मा, पांच-दस मिनट और।”

लेकिन ये पांच-दस मिनट कब दो घंटे में बदल जाते हैं, इसका हिसाब किसी के पास नहीं होता। आखिरकार नींद तो आती है, लेकिन तब तक रात लगभग बीत चुकी होती है। आज देश के लाखों घरों में हर रात यही कहानी दोहराई जा रही है।

जब रात दिन बन जाए और दिन रात

अगली सुबह भी तस्वीर कुछ अलग नहीं होती। बच्चे देर तक सोते रहते हैं। कई बार आवाज लगाने और समझाने के बाद ही बिस्तर छोड़ते हैं। उठते ही एक हाथ में मोबाइल और दूसरे हाथ में कॉफी का कप होता है। शरीर तो जाग जाता है, लेकिन दिन की प्राकृतिक लय पूरी तरह टूट चुकी होती है।

पूरी रात जागना, दोपहर में उठना और फिर अगली सुबह तक स्क्रीन के सामने बैठे रहना अब नई पीढ़ी के लिए सामान्य जीवनशैली बनती जा रही है। तकनीक बदल सकती है, जीवनशैली बदल सकती है, लेकिन इंसानी शरीर की मूलभूत आवश्यकताएं कभी नहीं बदलतीं। शरीर को आराम चाहिए, मन को गहरी नींद चाहिए और मस्तिष्क को स्वयं को फिर से व्यवस्थित करने के लिए शांत अंधेरा चाहिए।

तकनीक आगे बढ़ी, लेकिन शरीर के नियम नहीं बदले

आज की पीढ़ी मानो अपनी ही जैविक घड़ी के खिलाफ लड़ाई लड़ रही है। शायद उन्हें लगता है कि तकनीक और डिजिटल दुनिया के सहारे वे शरीर के प्राकृतिक नियमों को भी बदल सकते हैं। लेकिन प्रकृति के अपने नियम होते हैं। उन्हें न कोई ऐप बदल सकता है और न ही कोई एल्गोरिद्म।

नींद केवल आराम नहीं है। यह शरीर और मस्तिष्क की मरम्मत का समय है। जब यह लगातार छिनने लगती है, तो उसका असर धीरे-धीरे हमारे व्यवहार, सोच और स्वास्थ्य पर दिखाई देने लगता है।

एक बचपन जो अब केवल यादों में रह गया

एक समय था जब गर्मियों की छुट्टियां कुछ और ही मायने रखती थीं। खुले आसमान के नीचे छत पर सोना, तारों को निहारते हुए परिवार के साथ बातें करना, सुबह सूरज निकलने से पहले उठ जाना और पक्षियों की चहचहाहट के बीच दिन की शुरुआत करना हमारी दिनचर्या का हिस्सा था।

दिनभर खेलना, किताबें पढ़ना, दोस्तों के साथ गलियों में घूमना और परिवार के साथ समय बिताना ही सबसे बड़ा मनोरंजन हुआ करता था।

आज के कई बच्चे शायद यह भी नहीं जानते कि सूर्योदय वास्तव में कैसा दिखता है। वे सुबह की ठंडी हवा, पक्षियों के संगीत और प्रकृति की उस शांति से धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं।

यह सिर्फ आदत नहीं, भविष्य की चिंता है

यह बदलाव केवल पुरानी यादों का भावुक किस्सा नहीं है। यह हमारे बच्चों के शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और उनके भविष्य को लेकर एक गंभीर चिंता का विषय है।

आज के किशोरों ने जैसे समय की दिशा ही बदल दी है। रात उनका दिन बन गई है और दिन उनकी रात।

माता-पिता यह सब अपनी आंखों के सामने देखते हैं। पहले प्यार से समझाते हैं, फिर बार-बार रोकते हैं, कभी गुस्सा करते हैं और कभी अपने अनुभव साझा करते हैं। लेकिन उन्हें अक्सर वही जवाब सुनने को मिलते हैं—

“हमें सब पता है।”

“आप बेवजह चिंता करते हैं।”

“आजकल सब ऐसा ही करते हैं।”

“हमारी पीढ़ी अलग है।”

धीरे-धीरे माता-पिता चुप हो जाते हैं

बार-बार समझाने के बाद जब कुछ नहीं बदलता, तब माता-पिता धीरे-धीरे चुप हो जाते हैं। लेकिन यह चुप्पी हार की नहीं होती, बल्कि बेबसी की होती है।

वे जानते हैं कि शरीर के साथ किया गया हर समझौता एक दिन अपनी कीमत जरूर वसूलता है। युवावस्था में इंसान खुद को अजेय समझता है, लेकिन लगातार कम होती नींद, बिगड़ी हुई दिनचर्या, शारीरिक गतिविधियों की कमी और घंटों स्क्रीन के सामने बिताया गया समय धीरे-धीरे अपना असर दिखाने लगता है।

चिड़चिड़ापन बढ़ता है। एकाग्रता कम होती है। ऊर्जा घटती है। आत्मविश्वास कमजोर पड़ता है और जीवन की छोटी-छोटी खुशियां भी फीकी पड़ने लगती हैं।

सबसे बड़ा दर्द संवाद का टूट जाना

माता-पिता के लिए सबसे बड़ी पीड़ा यह नहीं होती कि उनके बच्चे गलतियां कर रहे हैं। सबसे बड़ा दुख यह होता है कि अब वे अपने ही बच्चों तक पहुंच नहीं पा रहे।

हर पीढ़ी को लगता है कि उसके माता-पिता उसे नहीं समझते। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी बच्चों को समझने में ही बिता देते हैं।

वे बच्चे के रोने की वजह पहचान लेते हैं। उसकी पहली असफलता का दर्द महसूस करते हैं। उसकी पहली सफलता पर सबसे ज्यादा खुश होते हैं। यहां तक कि जब बच्चा कुछ नहीं कहता, तब भी उसके चेहरे को देखकर उसके मन की बात पढ़ लेते हैं।

लेकिन एक दिन वही बच्चा आंखों में आंखें डालकर कह देता है—”आप कुछ नहीं समझते।”

शायद यही वह वाक्य है जो किसी भी माता-पिता के दिल को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाता है।

डांट नहीं, अनुभव और प्रेम बोलता है

माता-पिता कभी अपने बच्चों के दुश्मन नहीं होते। वे उनके सबसे पहले शुभचिंतक, सबसे बड़े समर्थक और सबसे सच्चे साथी होते हैं।

जब वे रात भर जागने से मना करते हैं, तो उसके पीछे नियंत्रण की इच्छा नहीं होती। उसके पीछे वर्षों का अनुभव, निस्वार्थ प्रेम और यह डर होता है कि जिन मुश्किलों से वे स्वयं गुजरे हैं, उनका सामना उनके बच्चों को न करना पड़े।

जब शब्द हार जाते हैं

एक समय ऐसा आता है जब माता-पिता समझ जाते हैं कि अब उनकी बातें असर नहीं कर रहीं। तब वे बहस करना छोड़ देते हैं। बच्चे अक्सर इस चुप्पी को उनकी बेरुखी समझ लेते हैं, जबकि सच्चाई यह होती है कि उनकी चिंता पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी होती है।

वे केवल यह स्वीकार कर लेते हैं कि अब जीवन ही बच्चों को वह सब सिखाएगा, जो उनके शब्द नहीं सिखा सके।

माता-पिता होना एक ऐसा रिश्ता है जिसकी कोई उम्र नहीं होती। बच्चे चाहे पचास साल के क्यों न हो जाएं, उनकी चिंता कभी खत्म नहीं होती।

नई पीढ़ी से एक छोटी-सी गुजारिश

यह जरूरी नहीं कि आप अपने माता-पिता की हर बात से सहमत हों। यह भी जरूरी नहीं कि आप उनके हर फैसले को मानें। अपने विचार रखें, अपने फैसले लें और अपनी जिंदगी अपने तरीके से जिएं।

लेकिन कभी-कभी उनकी डांट, उनकी चिंता और उनकी बार-बार की जाने वाली टोका-टोकी के पीछे छिपे प्रेम को भी महसूस करने की कोशिश कीजिए।

क्योंकि जिंदगी में एक समय ऐसा जरूर आता है, जब माता-पिता की कही हर बात का अर्थ खुद-ब-खुद समझ आने लगता है। तब अक्सर मन में केवल एक ही अफसोस रह जाता है—काश, उस समय उनकी बात मान ली होती।

एक प्रार्थना जो कभी खत्म नहीं होती

आज रात फिर कोई मां आधी रात को अपने बच्चे के कमरे की ओर देखेगी। कोई पिता सुबह देर तक सोते हुए अपने बेटे या बेटी को देखकर बिना कुछ कहे काम पर निकल जाएगा।

वे शायद अब बहस नहीं करेंगे, लेकिन उनके मन में एक ही प्रार्थना होगी—

“हे ईश्वर, मेरे बच्चों को स्वस्थ रखना, सुरक्षित रखना और उन्हें सही समय पर सही समझ देना।”

यदि इस संसार में कोई प्रेम पूरी तरह निस्वार्थ और निष्कलंक है, तो वह माता-पिता का प्रेम है। कभी वह समझाने के रूप में सामने आता है, कभी डांट बनकर, कभी चिंता बनकर और कई बार एक गहरी खामोशी बनकर।

यही चिंता, यही मौन और यही प्रार्थना माता-पिता के प्रेम की सबसे सच्ची भाषा है।