Jharkhand News: झारखंड में सरना कोड की मांग फिर तेज, सीएम हेमंत सोरेन ने राष्ट्रपति और पीएम को लिखा पत्र

झारखंड
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Jharkhand News: झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren ने एक बार फिर सरना धर्म के लिए अलग कोड की मांग उठाई है। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति Droupadi Murmu और प्रधानमंत्री Narendra Modi को पत्र लिखकर 2026 की जनगणना के दूसरे चरण में सरना धर्म और अन्य आदिवासी धार्मिक व्यवस्थाओं के लिए अलग कोड देने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यह कदम आदिवासी समाज की अलग पहचान और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए बेहद जरूरी है।

आदिवासी पहचान बचाने की बात

हेमंत सोरेन ने अपने पत्र में कहा कि झारखंड राज्य की पहचान आदिवासी समाज और उनकी संस्कृति से जुड़ी हुई है। राज्य की योजनाएं और नीतियां भी यहां के स्थानीय लोगों और आदिवासी समाज की भावनाओं को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। ऐसे में जनगणना में सरना धर्म के लिए अलग कोड मिलने से आदिवासी समुदाय की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को मजबूती मिलेगी।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि 2011 की जनगणना में अलग कोड नहीं होने के बावजूद देश के 21 राज्यों में लगभग 50 लाख लोगों ने अपनी धार्मिक पहचान के रूप में “सर्ना” लिखा था। इससे साफ है कि बड़ी संख्या में लोग इस पहचान को मानते हैं और अलग कोड की मांग लंबे समय से चल रही है।

2020 में विधानसभा ने पास किया था प्रस्ताव

सरना कोड की मांग कोई नई नहीं है। झारखंड विधानसभा ने साल 2020 में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास कर केंद्र सरकार से अलग सरना कोड देने की मांग की थी। राज्य सरकार लगातार इस मुद्दे को उठाती रही है। हेमंत सोरेन ने अपने हालिया पत्र में भी विधानसभा के उसी प्रस्ताव का जिक्र किया और कहा कि राज्य की जनता और आदिवासी समाज की भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

क्या है सरना धर्म?

सरना धर्म आदिवासी समुदाय की पारंपरिक आस्था मानी जाती है। इसमें प्रकृति पूजा को विशेष महत्व दिया जाता है। आदिवासी समुदाय पेड़-पौधों, जंगलों, पहाड़ों और ग्राम देवताओं की पूजा करता है। सरना शब्द का अर्थ “पवित्र उपवन” या “पवित्र जंगल” माना जाता है। झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और बिहार समेत कई राज्यों में बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय सरना परंपरा को मानते हैं।

जनगणना में अलग पहचान क्यों जरूरी?

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का कहना है कि अलग सरना कोड मिलने से आदिवासी समाज का सही डेटा सामने आएगा। इससे सरकार को आदिवासी समुदाय के लिए योजनाएं बनाने और विकास कार्यों को बेहतर तरीके से लागू करने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि जब देश में तकनीकी रूप से डिजिटल व्यवस्था मजबूत हो चुकी है, तब जनगणना में अलग धार्मिक पहचान देना कोई मुश्किल काम नहीं होना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि झारखंड में आदिवासी आबादी का प्रतिशत लगातार कम हो रहा है। पहले जहां राज्य में आदिवासी आबादी करीब 38 प्रतिशत थी, वहीं अब यह घटकर लगभग 26 प्रतिशत रह गई है। ऐसे में समुदाय की पहचान और अधिकारों की सुरक्षा के लिए अलग सरना कोड जरूरी हो गया है।

राजनीतिक और सामाजिक रूप से अहम मुद्दा

झारखंड में सरना कोड का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक रूप से काफी अहम माना जाता है। आदिवासी संगठन लगातार इसकी मांग करते रहे हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा भी इसे आदिवासी अस्मिता और सम्मान से जुड़ा मुद्दा बताता रहा है। वहीं केंद्र सरकार की ओर से अभी तक इस मांग पर अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।