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Bihar Election: दूसरों को जिताने वाले प्रशांत किशोर का ‘सूपड़ा साफ’, क्या अब राजनीति छोड़ेंगे पीके?

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16 नवंबर को प्रशांत किशोर करेंगे प्रेस कॉन्फ्रेंस

Bihar Election: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के शुरुआती रुझानों ने मशहूर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (Prashant Kishore) को करारा झटका दिया है। उनकी जन सुराज पार्टी सभी सीटों पर पिछड़ गई है। बिहार में पलायन को मुख्य मुद्दा बनाने, तीसरे विकल्प का दावा पेश करने और राज्यभर में पैदल यात्रा करने के बावजूद प्रशांत किशोर एक भी सीट जीतते दिखाई नहीं दे रहे। 243 सीटों में उनकी पार्टी कहीं भी बढ़त में नहीं है और अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त होती दिख रही है।

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पिछले छह महीनों में 6 साल में 6 सीएम बनवाने का दावा करने वाले प्रशांत किशोर (Prashant Kishore) ने सैकड़ों बार कहा था कि इस बार बिहार में बड़ा बदलाव वह लाएंगे। लेकिन चुनाव परिणामों ने उनकी रणनीति को पूरी तरह खारिज कर दिया। जन सुराज पार्टी, जिसने 1 करोड़ से अधिक सदस्यों का दावा किया था, 10 लाख वोट तक हासिल नहीं कर सकी। पार्टी ने लगभग 239 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिनमें से करीब 233 यानी 98 प्रतिशत की जमानत जब्त हो गई।

16 नवंबर को प्रशांत किशोर करेंगे प्रेस कॉन्फ्रेंस

जन सुराज के सूत्रों के मुताबिक, प्रशांत किशोर 16 नवंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे, जिसमें वे बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम और जन सुराज की आगामी रणनीति के बारे में जानकारी साझा करेंगे। लेकिन, इस चुनाव में जीत हासिल करने के लिए जन सुराज ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

150 सीटों के दावे से ‘जीरो’ तक

2 अक्टूबर 2024 को जन सुराज पार्टी की औपचारिक घोषणा के बाद प्रशांत किशोर ने दावा किया था कि उनकी पार्टी 150 सीटें जीत सकती है। लेकिन शुरुआती रुझानों में पार्टी का एक भी उम्मीदवार जीत के आसपास नहीं दिख रहा। कई सीटों पर जन सुराज उम्मीदवार चौथे-पांचवें नंबर पर हैं। यहां तक कि चुनाव आयोग की वेबसाइट पर भी पार्टी को लेकर आंकड़े नगण्य दिख रहे हैं।

लंबी पदयात्रा भी नहीं दिला सकी समर्थन

प्रशांत किशोर (Prashant Kishore) ने 6 हजार किलोमीटर की पदयात्रा कर 5 हजार गांवों में जनसंपर्क किया और 1,280 दिनों तक लगातार जमीन पर काम किया। उनका दावा था कि बिहार बदलाव को तैयार है। लेकिन एग्जिट पोल के पूर्वानुमान सही साबित हुए और जन सुराज पार्टी का प्रदर्शन अपेक्षाओं से बहुत दूर रह गया।

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‘10 सीट नहीं मिली तो राजनीति छोड़ दूंगा’- पीके का दावा

चुनाव से पहले प्रशांत किशोर ने दावा किया था कि उनकी पार्टी कम से कम 10 सीटें जीतेगी, वरना वे राजनीति छोड़ देंगे। साथ ही उन्होंने कहा था कि जेडीयू 25 से अधिक सीटें नहीं जीत पाएगी, और यदि ऐसा हुआ तो वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे। वर्तमान रुझानों में जेडीयू 75 सीटों से अधिक पर बढ़त बनाए हुए है, जिससे पीके के दावों पर सवाल और गहराते जा रहे हैं।

अतीत में बड़े नेताओं की जीत में निभाई थी भूमिका

2014 लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के अभियान को नई दिशा देने वाले पीके ने ‘चाय पे चर्चा’, ‘3D रैलियां’ और ‘रन फॉर यूनिटी’ जैसे कार्यक्रमों की रणनीति बनाई थी। 2015 में वे नीतीश कुमार के साथ भी जुड़े और बाद में जेडीयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने। इसके अलावा उन्होंने कांग्रेस, AAP और टीएमसी जैसे दलों के लिए भी काम किया।

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जातीय समीकरण और संगठन की कमी बड़ी वजह

जानकारों के मुताबिक, बिहार में जातीय समीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। प्रशांत किशोर ने डॉक्टरों, प्रोफेसरों और शिक्षाविदों को टिकट दिए, जिनकी सामाजिक पकड़ सीमित थी और वे जातिगत आधारों में फिट नहीं बैठते थे। इसके साथ ही जन सुराज का संगठनात्मक ढांचा कमजोर रहा, जिससे कई क्षेत्रों में पार्टी अपनी बात लोगों तक पहुंचाने में असफल रही।

आगे क्या करेंगे PK?

जन सुराज के प्रवक्ता पवन वर्मा ने एक निजी चैनल से बातचीत में कहा कि पार्टी ने पूरी ईमानदारी से काम किया है। उन्होंने कहा, ‘अगर जनता ने हमें स्वीकार नहीं किया, तो हम आत्मविश्लेषण करेंगे। बिहार प्रशांत को नहीं छोड़ सकता और न ही वे बिहार को छोड़ेंगे। नतीजों के बाद ही वह आगे की दिशा तय करेंगे।’

कुल मिलाकर, प्रशांत किशोर का पहला चुनावी सफर उम्मीदों के विपरीत साबित हुआ है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या वह राजनीति से दूरी बनाएंगे या नए सिरे से वापसी की तैयारी करेंगे।

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एक नज़र में- प्रशांत किशोर की हार की 5 बड़ी वजहें

  • जातीय समीकरण फेल- बिहार की राजनीति के सबसे अहम फैक्टर को साध नहीं पाए।
  • सोशल मीडिया पर ज्यादा निर्भरता- जमीन पर मजबूत पकड़ नहीं बन सकी।
  • खुद चुनाव न लड़ना- नेतृत्व की विश्वसनीयता कमजोर हुई।
  • बूथ और विधानसभा स्तर पर कमजोर नेटवर्क- संगठन की कमी ने असर दिखाया।
  • उम्मीदवार चयन में दिक्कतें- कई उम्मीदवार न राजनीतिक रूप से फिट थे, न जातीय तौर पर प्रभावी।