BBC के पूर्व संपादक संजीव श्रीवास्तव ने जयपुर में कचौड़ी की दुकान खोल ली जिसने अचानक से वरिष्ठ पत्रकार को सुर्खियों में ला दिया। मीडिया जगत में यही सवाल कि इतने बड़े पत्रकार को आखिर कचोड़ी की दुकान क्यों खोलनी पड़ी। वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी से सुनिए मित्र संजीव श्रीवास्तव की कहानी
ओम थानवी-
मुझे लगता है मेरे परम मित्र संजीव श्रीवास्तव, बीबीसी वाले, मज़े ले रहे हैं। उन्होंने मटर-कचौरी की दुकान खोल ली, क्योंकि “बचपन से यह सपना था”। नाम थोड़ा विलायती है, थोड़ा अपना — Throwback Desi (गुज़रे दिनों का स्वाद)!
यह वैसा ही उपक्रम है जैसे हमारे एमएफ़ हुसेन साहब दुनिया की सबसे महँगी गाड़ियों के मालिक हो कर नंगे पैर चलते थे। ख़बर बन जाती थी। कभी जिमख़ाना क्लब से रुख़सत होते हुए, कभी पाँचतारा होटल में दाख़िल होते हुए, निज़ामुद्दीन में चाय पीते हुए।
बड़े-बड़े अनेक कलाकारों ने चौंकाने वाली विचित्र हरकतें हैं। ताकि लोग भूलें नहीं। लेकिन संजीव तो कलाकार नहीं हैं। वे बीबीसी में देश के सबसे बड़े पद पर थे, मार्क टली की जगह आए। आज भी उनका अपना यूट्यूब चैनल है।
दिल्ली का उनका घर उस गुलमोहर पार्क बस्ती में है, जिसमें अमिताभ बच्चन ने घर बनाया था। इन दिनों जयपुर में जिस पुश्तैनी बंगले में रहते हैं, वहाँ घर न हो तो मैरिज गार्डन बन जाए। फिर कचौरी का धंधा?
इसलिए मुझे संजीव भाई ने कचौरी खाने बुलाया, पर अब तक गया नहीं। अभी अटकलें लगा रहा हूँ कि माज़रा क्या है। धंधा वे कर नहीं सकते। उनको ज़रूरत नहीं है। न उनके स्वभाव में है। शायद मनोरंजन कर रहे होंगे। अपना भी। पत्रकार बिरादरी का भी।
धंधा ही करना होता तो जयपुर की सबसे महँगी बस्तियों में एक — पत्रकार नंदकिशोर पारीक मार्ग, बापू नगर — में जहाँ दुकान खोली है, कुछ और बेचते। मटर की कचौरी? क्योंकि बचपन से ख़्वाहिश थी? मैं न मानूँ।
यह भी हो सकता है कि बेरोज़गारों से हमदर्दी में कोई शोशेबाज़ी हो। प्रधानपंत ने कहा था पकोड़े तलो। संजीव कचौरी तलवाने लगे। हालाँकि वे बड़े विनोदी स्वभाव के हैं। पर, क़सम से, इतने विनोदी? मैंने सपने में न सोचा था।
