JEE Mains

JEE Mains में 99 परसेंटाइल और 25 लाख का कोचिंग का खर्च, फिर भी नहीं मिला IIT!

एजुकेशन
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21 अप्रैल को घोषित हुए Joint Entrance Examination Main (JEE Mains) के परिणामों ने एक बार फिर देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं के बढ़ते दबाव पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस वर्ष 26 छात्रों ने पूरे 100 परसेंटाइल हासिल कर सुर्खियां बटोरीं, लेकिन इन चमकदार आंकड़ों के पीछे हजारों ऐसे छात्र और परिवार हैं जो उच्च अंक लाने के बावजूद अनिश्चितता और तनाव का सामना कर रहे हैं।

विशेषज्ञों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि अब केवल अच्छे अंक लाना ही सफलता की गारंटी नहीं रह गया है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा, सीमित सीटें और महंगी कोचिंग व्यवस्था ने छात्रों और अभिभावकों दोनों के लिए स्थिति को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

99.2 परसेंटाइल के बाद भी आईआईटी में प्रवेश की चिंता

परिणाम आने के बाद कई अभिभावकों ने चिंता जताई कि इतने अच्छे अंक लाने के बावजूद बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं दिख रहा है। एक उदाहरण में, Varanasi के एक अभिभावक ने बताया कि उनकी बेटी ने 99.2 परसेंटाइल स्कोर किया है, लेकिन फिर भी उन्हें यह डर है कि उसे मनचाहे कॉलेज या ब्रांच में प्रवेश मिलेगा या नहीं।

अभिभावकों के अनुसार, उन्होंने अपनी बेटी की पढ़ाई और कोचिंग पर करीब 18 लाख रुपये खर्च किए हैं। यह राशि केवल फीस तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसमें रहने, खाने और अन्य सुविधाओं का खर्च भी शामिल होता है। ऐसे में उच्च अंक मिलने के बाद भी अनिश्चितता परिवारों के लिए मानसिक दबाव का कारण बन रही है।

सीटों की सीमित संख्या और बढ़ती प्रतिस्पर्धा

अगर आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्थिति और स्पष्ट हो जाती है। इस वर्ष करीब 30 हजार छात्र ऐसे हैं जिन्होंने 99 परसेंटाइल या उससे अधिक अंक प्राप्त किए हैं। दूसरी ओर, देश के सभी Indian Institutes of Technology (आईआईटी) में कुल मिलाकर केवल 17,385 सीटें उपलब्ध हैं।

इसका सीधा अर्थ है कि उच्च अंक प्राप्त करने के बावजूद सभी छात्रों को मनचाही सीट या कॉलेज नहीं मिल सकता। उदाहरण के तौर पर, पिछले वर्ष Indian Institute of Technology Bombay में कंप्यूटर साइंस शाखा की अंतिम रैंक मात्र 66 थी। यानी देशभर के लाखों छात्रों में शीर्ष स्थान पर आना ही इस प्रतिष्ठित शाखा में प्रवेश का एकमात्र रास्ता बन गया है।

58,000 करोड़ रुपये की कोचिंग इंडस्ट्री का बढ़ता प्रभाव

देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी अब एक बड़े उद्योग का रूप ले चुकी है। अनुमान के अनुसार, कोचिंग इंडस्ट्री का आकार लगभग 58,000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। विशेष रूप से Kota जैसे शहर इस उद्योग के प्रमुख केंद्र बन चुके हैं, जहां हर साल लाखों छात्र तैयारी के लिए आते हैं।

वर्तमान समय में दो साल की कोचिंग और रहने का कुल खर्च 15 से 25 लाख रुपये तक पहुंच गया है। कई परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए गहने गिरवी रखने या जमीन बेचने जैसे कठिन निर्णय लेने को मजबूर हो रहे हैं। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति शिक्षा के व्यावसायीकरण को दर्शाती है, जहां सफलता को एक उत्पाद की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है।

बढ़ती प्रतिस्पर्धा और ‘मार्क्स की महंगाई’ का प्रभाव

शिक्षा जगत में एक नई समस्या तेजी से उभर रही है, जिसे कई विशेषज्ञ ‘मार्क्स की महंगाई’ (Marks Inflation) कह रहे हैं। जब एक ही परीक्षा में बड़ी संख्या में छात्र बेहद उच्च अंक प्राप्त करते हैं, तो उन अंकों का मूल्य और प्रतिस्पर्धा का स्तर दोनों बदल जाते हैं।

इस वर्ष 26 छात्रों द्वारा 100 परसेंटाइल हासिल करना इस बात का संकेत है कि परीक्षा प्रणाली में अंक प्राप्त करने की प्रक्रिया अधिक प्रतिस्पर्धी और जटिल हो गई है। इसके परिणामस्वरूप छात्रों को केवल विषय की समझ ही नहीं, बल्कि परीक्षा के पैटर्न और रणनीति पर भी विशेष ध्यान देना पड़ रहा है।

कोचिंग आधारित तैयारी और रटने की प्रवृत्ति पर सवाल

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान कोचिंग प्रणाली छात्रों को विषय की गहराई से समझ विकसित करने के बजाय परीक्षा पास करने की तकनीक सिखाने पर अधिक केंद्रित हो गई है। इसमें शॉर्टकट्स, पुराने प्रश्नपत्रों का अभ्यास और समय प्रबंधन जैसी रणनीतियों पर जोर दिया जाता है।

हालांकि यह तरीका परीक्षा में अच्छे अंक दिलाने में मदद करता है, लेकिन इससे छात्रों की रचनात्मक सोच और नवाचार क्षमता प्रभावित हो सकती है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शिक्षा केवल अंक और रैंक तक सीमित हो जाए, तो भविष्य में वैज्ञानिक और शोधकर्ता तैयार करना कठिन हो सकता है।

शिक्षा प्रणाली में सुधार की बढ़ती जरूरत

वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि प्रवेश प्रक्रिया को अधिक संतुलित और बहुआयामी बनाया जाए, ताकि केवल एक परीक्षा के आधार पर छात्रों का भविष्य तय न हो।

इसके अलावा, स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, करियर विकल्पों की विविधता और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना भी जरूरी माना जा रहा है। इससे छात्रों और अभिभावकों पर पड़ने वाला दबाव कम किया जा सकता है और शिक्षा को अधिक समावेशी बनाया जा सकता है।