Chhattisgarh News: पद्म विभूषण तीजन बाई का निधन: पंडवानी की अमर आवाज हुई खामोश, लोककला जगत में शोक की लहर

छत्तीसगढ़
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Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने वाली प्रख्यात पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई का रविवार तड़के रायपुर एम्स में निधन हो गया। वह लंबे समय से अस्वस्थ थीं। उनके निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला और संस्कृति जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। उनके जाने के साथ भारतीय लोककला ने अपनी सबसे प्रभावशाली आवाजों में से एक को खो दिया।

संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि

छत्तीसगढ़ के संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल ने तीजन बाई के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि वह केवल एक लोक कलाकार नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान की जीवंत प्रतीक थीं। उन्होंने अपने अद्भुत गायन, अभिनय और कथावाचन शैली के माध्यम से पंडवानी जैसी लोकविधा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मान दिलाया।

उन्होंने कहा कि तीजन बाई का निधन प्रदेश और देश की सांस्कृतिक विरासत के लिए अपूरणीय क्षति है। मंत्री ने ईश्वर से दिवंगत आत्मा की शांति तथा शोक संतप्त परिवार को यह दुख सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की।

साधारण परिवार से विश्व मंच तक का प्रेरक सफर

24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई का जीवन संघर्ष और साधना का उदाहरण रहा। उनके पिता हुकुमचंद परधा और माता सुखवती बाई थे। बचपन से ही उन्हें महाभारत की कथाओं और पंडवानी गायन में विशेष रुचि थी। इस लोककला की प्रारंभिक शिक्षा उन्हें अपने नाना ब्रजलाल परधा से मिली।

महज 13 वर्ष की आयु में उन्होंने पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। उस समय महिलाओं द्वारा बैठकर पंडवानी प्रस्तुत करने की परंपरा थी, लेकिन तीजन बाई ने इस परंपरा को तोड़ते हुए पुरुष कलाकारों की कापालिक शैली में खड़े होकर अभिनय, संवाद, गायन और भाव-भंगिमाओं के साथ प्रस्तुति देना शुरू किया। यही शैली आगे चलकर उनकी पहचान बन गई।

हबीब तनवीर ने दी राष्ट्रीय पहचान

प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी असाधारण प्रतिभा को पहचाना और उन्हें बड़े मंचों तक पहुंचने का अवसर दिया। इसके बाद तीजन बाई ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हस्तियों के सामने अपनी प्रस्तुतियां दीं।

उन्होंने इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, जापान, तुर्की, मॉरीशस सहित 17 से अधिक देशों में पंडवानी का प्रदर्शन कर छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को विश्वभर में नई पहचान दिलाई। उनकी दमदार आवाज और प्रभावशाली मंच प्रस्तुति ने विदेशी दर्शकों को भी भारतीय लोक परंपरा से परिचित कराया।

पद्मश्री से पद्म विभूषण तक का सम्मानित सफर

लोककला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें वर्ष 1988 में पद्मश्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2003 में पद्म भूषण, 2018 में जापान का फुकुओका पुरस्कार तथा 2019 में भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण प्रदान किया गया। इसके अलावा बिलासपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डी.लिट. की उपाधि से भी सम्मानित किया।

नई पीढ़ी की प्रेरणा बनीं तीजन बाई

तीजन बाई ने केवल पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक नहीं पहुंचाया, बल्कि इस लोकविधा से नई पीढ़ी के कलाकारों को भी जोड़ा। विशेष रूप से अनेक महिला कलाकारों ने उनकी प्रेरणा से इस क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने यह सिद्ध किया कि प्रतिभा, समर्पण और आत्मविश्वास के बल पर लोककला को विश्व मंच तक पहुंचाया जा सकता है।

देशभर से उमड़ी श्रद्धांजलियां

तीजन बाई के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, विभिन्न जनप्रतिनिधियों, कलाकारों, साहित्यकारों और सांस्कृतिक संस्थाओं ने गहरा शोक व्यक्त किया। सभी ने उन्हें भारतीय लोकसंस्कृति की अमूल्य धरोहर बताते हुए उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया।

हमेशा अमर रहेगी उनकी सांस्कृतिक विरासत

तीजन बाई का जीवन संघर्ष, साधना और कला के प्रति समर्पण की अद्भुत मिसाल था। उन्होंने महाभारत की लोकगाथाओं को अपनी विशिष्ट शैली में जन-जन तक पहुंचाया और पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। आज भले ही उनकी आवाज हमेशा के लिए शांत हो गई हो, लेकिन उनकी कला, उनकी शैली और उनकी सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों को निरंतर प्रेरित करती रहेगी। भारतीय लोककला के इतिहास में उनका नाम सदैव स्वर्णाक्षरों में दर्ज रहेगा।