10 साल में 45 से अधिक शिशुओं को नई जिंदगी मिली
Rajasthan News: राजस्थान सरकार (Rajasthan Government) की बाल संरक्षण नीति के अंतर्गत एक सराहनीय पहल ने अलवर (Alwar) जिले में नई मिसाल कायम की है। जनाना अस्पताल परिसर में संचालित बाल गृह, अनाथ और अभिभावकविहीन बच्चों के लिए आशा की किरण बनकर उभरा है। यह बाल गृह 0 से 6 वर्ष की आयु के उन शिशुओं को आश्रय प्रदान करता है, जो सड़कों, झाड़ियों या पालना गृह में लावारिस छोड़ दिए जाते हैं। पढ़िए पूरी खबर…

10 वर्षों में 45 से अधिक बच्चों को मिला नया जीवन
यह बाल गृह (Children’s Home) पिछले दस वर्षों में 45 से अधिक नवजात और छोटे बच्चों को नई जिंदगी देने में सफल रहा है। इनमें से कई बच्चे भाग्यशाली रहे जिन्हें विदेशों में बसे दंपतियों ने गोद लिया। यह न केवल इन बच्चों को बेहतर भविष्य की ओर ले गया, बल्कि राजस्थान की सामाजिक सरोकारों के प्रति संवेदनशीलता को भी दर्शाता है।
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पालना गृह और कंट्रोल रूम की त्वरित कार्रवाई
राज्य सरकार द्वारा जनाना अस्पताल में संचालित पालना गृह और कंट्रोल रूम की व्यवस्था सरकार की प्रभावी कार्यप्रणाली को दर्शाती है। प्रभारी शिशु चिकित्सालय डॉ. महेश शर्मा (Dr. Mahesh Sharma) के अनुसार, जैसे ही कोई शिशु पालना गृह में छोड़ा जाता है, इसकी सूचना तुरंत कंट्रोल रूम को दी जाती है। वहां 24 घंटे तैनात स्टाफ तत्परता से मौके पर पहुंचकर शिशु को सुरक्षित रिकवर करता है, उसके बाद नर्सरी में चिकित्सकीय परीक्षण के लिए भर्ती किया जाता है और फिर शिशु गृह में स्थानांतरित किया जाता है।

गोद लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता
इस पूरे तंत्र में पारदर्शिता भी सुनिश्चित की गई है। जिला बाल संरक्षण इकाई एवं बाल अधिकारिता विभाग के सहायक निदेशक संजय वर्मा ने जानकारी दी कि अलवर जनाना अस्पताल परिसर में संचालित राजकीय विशेषज्ञ दत्तक ग्रहण एजेंसी (SAA) द्वारा इन बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया पूरी की जाती है। बाल कल्याण समिति के माध्यम से बच्चों को मान्यता प्राप्त संस्थानों में भेजा जाता है, जहां से इच्छुक दंपतियों द्वारा उन्हें अपनाया जा सकता है। यह सुनिश्चित किया जाता है कि हर बच्चे को एक सुरक्षित, प्यार भरा परिवार मिल सके।
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राजस्थान सरकार (Rajasthan Government) ने राज्यभर में बाल संरक्षण के लिए व्यापक नीति बनाई है। पालना गृह योजना के माध्यम से न केवल लावारिस बच्चों को आश्रय और चिकित्सा सहायता दी जाती है, बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए गोद लेने की प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और संवेदनशील बनाया गया है। अलवर का यह मॉडल देशभर के लिए एक प्रेरणास्रोत बनता जा रहा है।
