Upendra Rai: दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारत एक्सप्रेस समाचार समूह के चेयरमैन उपेंद्र राय के खिलाफ दर्ज सीबीआई की एफ.आई.आर. को कानूनन आधारहीन बताते हुए निरस्त (Quash) कर दिया है. न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की एकल पीठ ने यह आदेश पारित किया. गौरतलब है कि सीबीआई द्वारा उपेंद्र राय के खिलाफ इससे पहले 2019 में दर्ज एक मामला भी जांच के बाद बंद कर दिया गया था. यह एकमात्र मामला था जिसमें उपेंद्र राय को अभियुक्त के रूप में दर्शाया गया था, परंतु न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि कानूनी दृष्टि से यह मामला बनता ही नहीं था.
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उपेंद्र राय ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सीबीआई की उस एफआईआर (संख्या RC2172018A0004, दिनांक 05 मई 2018) को रद्द करने की मांग की थी, जो धारा 120-बी, 384 IPC और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज की गई थी. उन्होंने अदालत को बताया कि इस मामले में सीबीआई द्वारा दाखिल आरोपपत्र और पूरक आरोपपत्र, दोनों में से किसी में भी, किसी भी लोक सेवक (Public Servant) का नाम या पहचान सामने नहीं आई है. जांच एजेंसी ने भी स्वयं स्वीकार किया है कि किसी सरकारी अधिकारी की कोई भूमिका सामने नहीं आई है. तथ्यों के अवलोकन के बाद न्यायालय ने माना कि इस मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कोई अपराध प्रथम दृष्टया (prima facie) स्थापित ही नहीं होता.

निजी विवाद निकला मामला
मामले में दर्ज एफआईआर को लेकर यह भी सामने आया कि यह विवाद वास्तव में शिकायतकर्ता कंपनी और उपेंद्र राय के बीच एक निजी विवाद था, जो एक कंसल्टेंसी एग्रीमेंट को लेकर उत्पन्न हुई गलतफहमी का परिणाम था. शिकायतकर्ता कंपनी ने बाद में अपनी गलती स्वीकार करते हुए 16 नवंबर 2019 को बोर्ड में प्रस्ताव पारित किया और निर्णय लिया गया कि कंपनी शिकायत को आगे नहीं बढ़ाएगी. इस संबंध में सीबीआई को भी पत्र द्वारा सूचना दी गई. साथ ही कंपनी की ओर से “नो ऑब्जेक्शन हलफनामा” भी अदालत में दाखिल किया गया. जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि उन्हें एफआईआर और उससे जुड़ी कार्यवाहियों को रद्द किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है.
सीबीआई का विरोध असफल
सीबीआई ने अदालत के समक्ष एफ.आई.आर. निरस्तीकरण का विरोध किया. लेकिन यह भी स्वीकार किया कि जांच के दौरान किसी भी सरकारी अधिकारी की पहचान नहीं हो सकी है. इस पर न्यायालय ने सवाल किया कि जब मामले में किसी सरकारी अधिकारी का जिक्र ही नहीं है तो भ्रष्टाचार का आरोप किस आधार पर बनता है?
FIR की निरस्त
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने अपने आदेश में CBI एफआईआर और उससे संबंधित सभी कार्यवाहियों को निरस्त कर दिया और लिखा कि इस मामले में “न तो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की कोई धारा लागू होती है, और न ही किसी अपराध का तत्व.” इसके साथ ही अदालत ने याचिका का निपटारा करते हुए मामले को समाप्त कर दिया।
ED में दर्ज मामला भी ख़त्म
अदालत के इस आदेश के बाद अब प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा उपेंद्र राय के खिलाफ दर्ज किया गया मामला भी खत्म हो गया है. दरअसल ED ने CBI की इसी एफआईआर के आधार पर उपेंद्र राय के खिलाफ मामला दर्ज किया था. चूंकि अदालत ने CBI द्वारा दर्ज मूल मामले को ही औचित्यहीन मानते हुए निरस्त कर दिया है, तो उपेंद्र राय के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय में दर्ज मामला भी स्वयं खत्म हो गया है.
2019 में भी हुआ था ऐसा ही निष्कर्ष
गौरतलब है कि सीबीआई द्वारा उपेंद्र राय के खिलाफ इससे पहले 2019 में दर्ज एक मामला भी जांच के बाद बंद कर दिया गया था. इस तरह, यह एकमात्र मामला था जिसमें उपेंद्र राय को अभियुक्त के रूप में दर्शाया गया था, परंतु न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि कानूनी दृष्टि से यह मामला बनता ही नहीं था.
