Punjab News: कभी-कभी जिंदगी ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ी कर देती है, जहां हर रास्ता बंद नजर आता है। लेकिन अगर समय पर सही मदद मिल जाए, तो उम्मीद की एक किरण अंधेरे को भी चीर देती है। पटियाला के रहने वाले गुरपिंदर जीत सिंह और उनकी मां बलजीत कौर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जहां एक बेटे की जिद और सरकार की योजना ने मिलकर मौत से जंग जीत ली।
अचानक बिगड़ी मां की तबीयत, बढ़ने लगी चिंता
करीब पांच महीने पहले 65 साल की बलजीत कौर की तबीयत अचानक खराब होने लगी। उन्होंने धीरे-धीरे खाना-पीना कम कर दिया और कमजोरी बढ़ती चली गई। गुरपिंदर के लिए यह एक सामान्य बीमारी नहीं थी, बल्कि हर दिन बढ़ती चिंता और डर का कारण बन गई थी।
उन्होंने पहले निजी डॉक्टरों के पास इलाज कराया, लेकिन कोई खास सुधार नहीं हुआ। आखिरकार परिवार ने Rajindra Hospital का सहारा लिया। यहां कई तरह के टेस्ट और जांच हुईं, लेकिन रिपोर्ट आने के बाद जो सच्चाई सामने आई, उसने पूरे परिवार को हिला कर रख दिया—बलजीत कौर को बच्चेदानी का कैंसर था।

इलाज की शुरुआत और बढ़ता आर्थिक बोझ
मां की जान बचाने के लिए गुरपिंदर ने बिना देर किए उन्हें Tata Memorial Cancer Hospital ले जाने का फैसला किया। वहां इलाज शुरू हुआ, लेकिन पहले ही चरण में 60 से 65 हजार रुपये खर्च हो गए।
एक साधारण ड्राइवर की सीमित आय के सामने यह रकम बहुत बड़ी थी। परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि आगे का इलाज कैसे होगा। कर्ज लेने की नौबत आ चुकी थी और भविष्य पूरी तरह अनिश्चित नजर आ रहा था।
अंधेरे में मिली उम्मीद की किरण
इसी मुश्किल समय में अस्पताल में एक अनजान व्यक्ति ने गुरपिंदर को मुख्यमंत्री सेहत योजना के बारे में बताया। यह जानकारी उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं थी।
गुरपिंदर ने तुरंत योजना के तहत रजिस्ट्रेशन करवाया और कुछ ही समय में उनके मोबाइल पर स्मार्ट कार्ड बनने का मैसेज आ गया। इसके बाद इलाज का पूरा खर्च योजना के तहत कवर हो गया।
महंगे टेस्ट, बार-बार कीमोथेरेपी, ऑपरेशन, दवाइयां, आईसीयू और वेंटिलेटर तक का खर्च सरकार ने उठाया। यह मदद उनके लिए एक नई जिंदगी की शुरुआत साबित हुई।
डॉक्टरों के सामने भी बड़ी चुनौती
डॉक्टरों के अनुसार, यह केस बेहद जटिल था क्योंकि कैंसर बच्चेदानी से बढ़कर लीवर और फेफड़ों तक फैल चुका था। पहले तीन बार कीमोथेरेपी दी गई, लेकिन शरीर कमजोर होने के कारण दुष्प्रभाव सामने आए।
इसके बाद डॉक्टरों ने सावधानी से कीमोथेरेपी की डोज कम कर दी और कुल नौ बार इलाज किया। धीरे-धीरे ट्यूमर एक जगह सिमट गया और ऑपरेशन का रास्ता साफ हुआ।
करीब आठ घंटे लंबे ऑपरेशन में डॉक्टरों की टीम ने ट्यूमर को सफलतापूर्वक निकाल दिया। ऑपरेशन के बाद बलजीत कौर को दो-तीन दिन आईसीयू और वेंटिलेटर पर रखा गया, फिर उनकी हालत सुधरने लगी।
बेटे का समर्पण और मां की हिम्मत
इस पूरे सफर में गुरपिंदर हर पल अपनी मां के साथ खड़े रहे। कभी दवा देना, कभी हौसला बढ़ाना और कभी सिर सहलाना—उन्होंने हर जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाई।
आठ दिन अस्पताल में रहने के बाद जब मां की हालत बेहतर हुई, तो परिवार के चेहरे पर मुस्कान लौट आई। यह केवल एक इलाज नहीं था, बल्कि एक बेटे के अटूट प्रेम और समर्पण की मिसाल थी।
8 लाख रुपये से ज्यादा का खर्च, योजना ने दी राहत
डॉक्टरों के मुताबिक, इस सर्जरी और इलाज पर 8 लाख रुपये से ज्यादा का खर्च आया। अगर यह राशि खुद देनी पड़ती, तो गुरपिंदर के लिए यह लगभग असंभव था।
हालांकि कुछ दवाइयां जो अस्पताल में उपलब्ध नहीं थीं, उनका खर्च उन्होंने खुद उठाया, लेकिन बाकी पूरा इलाज योजना के तहत मुफ्त हुआ। आगे के इलाज और जांच के लिए उन्हें मुल्लांपुर स्थित अस्पताल में नियमित फॉलोअप के लिए जाना होगा।
एक योजना जिसने बचा लिया पूरा परिवार
दो बच्चों के पिता और एक साधारण ड्राइवर गुरपिंदर के लिए यह राहत किसी चमत्कार से कम नहीं है। उनकी आंखें भर आती हैं जब वह कहते हैं:
“अब सुकून है कि मां बिना इलाज के नहीं मरेगी, सरकार ने हमें उम्मीद दी है।”
यह कहानी केवल एक मरीज के इलाज की नहीं है, बल्कि एक बेटे के संघर्ष, मां के प्रति उसके प्रेम और एक ऐसी सरकारी योजना की है, जिसने मुश्किल वक्त में सहारा बनकर एक परिवार को टूटने से बचा लिया।
