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News Channel: रक्तचूसक एडिटर बनवारीलाल..द्वितीय अध्याय

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कर्मचारियों का FNF और इंसानियत का गला घोंटने की कला कोई इनसे सीखे!

News Channel: पिछली बार हमने आपको बताया कि बनवारीलाल एडिटर कैसे अपने कर्मचारियों का खून चूस रहे हैं। इस बार, कहानी और भी तीखी है। अगर आप सोचते हैं कि बनवारीलाल सिर्फ काम का बोझ डालते हैं, तो यह जान लीजिए कि उसके साथ-साथ वो नौकरी छोड़ने वालों का भी पीछा नहीं छोड़ते।

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“जाओ तो जाओ, मगर FNF भूल जाओ”

जिस चैनल में कभी नौकरी छोड़ने के 45 दिन में FNF मिल जाता था, वहां अब कर्मचारियों को 6–6 महीने तक भटकाया जा रहा है। बनवारीलाल का फरमान है कि जो लोग चैनल छोड़ते हैं, उन्हें FNF के लिए लंबा इंतजार करना होगा—इतना लंबा कि या तो वो भूल जाएं या चैनल के दरवाजे पर आंसू बहाएं। अब सवाल यह उठता है कि भारत सरकार का कानून साफ-साफ कहता है कि FNF दो दिन के अंदर देना चाहिए। लेकिन बनवारीलाल और उनके “रीढ़विहीन HR” ने कानून को अपने जूते के नीचे रख दिया है। हद तो तब हो गई जब बनवारीलाल ने खुद नौकरी छोड़ चुके कर्मचारियों को लीगल नोटिस भिजवा दिया।

लीगल नोटिस की लीला और दत्तक पुत्र का ज्ञान

चैनल छोड़ने वालों को धमकाया जा रहा है कि उनके पास “गुप्त दस्तावेज” हैं। सुनने में आया है कि ये ‘गुप्त दस्तावेज’ की थ्योरी बनवारीलाल के नए दत्तक पुत्र की उपज है, जिसे हाल ही में प्रमोशन देकर लाला की कंपनी में लाया गया फिर 3 महीने में अभी फिर प्रमोशन दिया गया है। उसका असली जूनियर बनवारी? बनवारीलाल के घर सिलेंडर और सब्जियां समय पर पहुंचाना। यह दत्तक पुत्र, जिसे “नवीनतम ज्ञान कोश” कहा जाता है, चैनल के हर विभाग को चलाने की सलाह देता है—आउटपुट से लेकर प्रोडक्शन तक। लेकिन जिस विभाग का वह ठेका लेकर बैठा है, उसकी स्थिति किसी कबाड़खाने से कम नहीं।

FNF का इंतजार और कर्मचारियों की बगावत

आज की स्थिति यह है कि चैनल में कोई भी कर्मचारी नोटिस पीरियड तक सर्व करने को तैयार नहीं है। सब जानते हैं कि चाहे जितना भी समय दें, FNF की राशि तो कब्र से निकालनी पड़ेगी। चैनल छोड़ चुके 2 दर्जन से ज्यादा कर्मचारी अब तक अपनी बकाया राशि के इंतजार में हैं।

तो सवाल यह उठता है क्या बनवारीलाल लाला का चैनल चैनल चलाने आए हैं या कर्मचारियों की दुर्गति करने? HR किस बात का डरकर मूकदर्शक बना हुआ है? और सबसे अहम, कब तक ये लीला चलती रहेगी? चैनल का नाम बूझो तो जानें, लेकिन अगर बनवारीलाल पढ़ रहे हैं तो जरूर कहेंगे, “जो लिखना है, लिखो। मैं नहीं बदलूंगा।” शायद उनकी यही ज़िद चैनल को और बर्बाद कर देगी।

“रक्तचूसक की गाथा जारी रहेगी…”

अगली बार हम आपको बताएंगे कि बनवारीलाल और उनके दत्तक पुत्र ने कर्मचारियों के रोजमर्रा के जीवन में और क्या-क्या ‘क्रांतिकारी बदलाव’ किए हैं। बने रहिए।

Disclaimer: ख़बरी मीडिया को भेजे गए पत्र पर आधारित..ख़बरी मीडिया ख़बर की सत्यता की पुष्टि नहीं करता है)