Jharkhand News: झारखंड के मुख्यमंत्री Hemant Soren करीब 10 दिनों के असम दौरे के बाद रांची लौट आए हैं। इस दौरान उन्होंने अपनी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के उम्मीदवारों के समर्थन में कई रैलियां और जनसभाएं कीं। उनके साथ विधायक कल्पना सोरेन भी लगातार चुनावी मैदान में सक्रिय रहीं। इस पूरे अभियान में पार्टी ने अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश की।
सीमित सीटों पर भी मजबूत रणनीति
असम विधानसभा चुनाव में JMM ने 126 में से कुछ चुनिंदा सीटों पर ही उम्मीदवार उतारे, लेकिन ये सीटें रणनीतिक रूप से अहम मानी जा रही हैं। खासकर चाय बागान और आदिवासी बहुल इलाकों को ध्यान में रखकर पार्टी ने अपनी रणनीति तैयार की। इन क्षेत्रों में लगातार सभाएं कर पार्टी ने अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की।
आदिवासी और टी-ट्राइब्स पर फोकस
हेमंत सोरेन ने अपने पूरे अभियान में आदिवासी और चाय बागान मजदूर समुदाय के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने इन समुदायों के अधिकार, पहचान और सामाजिक स्थिति को लेकर बात की। साथ ही न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने और ST दर्जे जैसे मुद्दों को भी चुनावी एजेंडा बनाया गया, जिससे इन वर्गों का समर्थन हासिल किया जा सके।
प्रचार के दौरान आईं चुनौतियां
चुनावी प्रचार के दौरान कुछ जगहों पर कार्यक्रमों में बाधा आने की भी बात सामने आई। हेलीकॉप्टर की अनुमति न मिलने जैसी घटनाओं के कारण कार्यक्रम प्रभावित हुए। इसके बावजूद हेमंत सोरेन ने प्रचार जारी रखा और मोबाइल के जरिए भी जनता को संबोधित किया। यह दिखाता है कि पार्टी हर परिस्थिति में चुनावी मैदान में सक्रिय रही।
वापसी के बाद क्या बोले हेमंत सोरेन
रांची लौटने के बाद मुख्यमंत्री ने कहा कि पार्टी ने असम में अपनी पूरी मेहनत की है और अब फैसला जनता के हाथ में है। उन्होंने यह भी कहा कि असम में आदिवासियों की स्थिति चिंता का विषय है और JMM एक मजबूत विकल्प बनकर उभरी है। साथ ही उन्होंने चुनाव में गड़बड़ी की आशंका भी जताई।
क्या JMM बनेगी किंगमेकर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर JMM कुछ सीटें भी जीतती है, तो वह सरकार बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है। खुद हेमंत सोरेन ने भी संकेत दिए हैं कि कम सीटों के बावजूद पार्टी निर्णायक स्थिति में आ सकती है। यह पूरा अभियान केवल चुनाव तक सीमित नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में पहचान बनाने की दिशा में भी एक कदम माना जा रहा है।
