Caste Census: भारत में सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। आपको बता दें कि केंद्र की मोदी सरकार (Modi Government) ने बुधवार को हुई कैबिनेट बैठक (Cabinet Meeting) में जातिगत जनगणना (Caste Census) को मंजूरी प्रदान कर दी है। यह निर्णय न केवल सामाजिक संरचना को बेहतर समझने की ओर बढ़ा हुआ एक कदम है, बल्कि यह उस मांग की भी पुष्टि है जिसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) पिछले कई सालों से पुरजोर तरीके से करते आ रहे हैं। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले जिस मुद्दे को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) ने लगातार आवाज बुलंद की, अब वही आवाज देशव्यापी नीतियों में बदलती दिखाई दे रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में लिए गए ऐतिहासिक फैसले ने देश की सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर को नया आयाम दिया। केंद्र सरकार ने जातिगत जनगणना कराने का फैसला लिया है, जिससे देश में पहली बार स्वतंत्रता के बाद व्यापक स्तर पर जातिगत जनगणना होगी। यह फैसला न केवल सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा, बल्कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) की दूरदर्शिता को भी बताता है। सीएम नीतीश कुमार ने न केवल बिहार में, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना को लागू करने के लिए लगातार प्रयास किए, और उनका यह विजन अब देशव्यापी स्वरूप ले रहा है।
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नीतीश कुमार के संघर्ष की हुई जीत
बिहार के लोकप्रिय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) लंबे समय से जातिगत जनगणना कराने की मांग कर रहे थे। उनकी यह मांग केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को बताती है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का मानना है कि जातिगत आंकड़ों के अभाव में विभिन्न समुदायों की वास्तविक स्थिति का आकलन करना और उनके लिए लक्षित योजनाएं बनाना मुश्किल होता है। सीएम नीतीश (CM Nitish Kumar) की यह सोच का आधार यह है कि जाति भारत की सामाजिक संरचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, और इसके आंकड़े सामाजिक-आर्थिक नीतियों को और प्रभावी बनाने में सहायक होंगे।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (CM Nitish Kumar) ने इस मुद्दे को पहली बार 2019 में बिहार विधानसभा (Bihar Legislative Assembly) में उठाया था, जब 18 फरवरी 2019 को विधानसभा ने सर्वसम्मति से जातिगत जनगणना का प्रस्ताव पारित किया। इसके बाद 27 फरवरी 2020 को बिहार विधान परिषद ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन मिला। सीएम नीतीश ने केंद्र सरकार से बार-बार अनुरोध किया कि जनगणना में जाति आधारित आंकड़े शामिल किए जाएं। उनकी यह मांग तब और तेज हुई जब केंद्र ने 2021 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा कि 2021 की जनगणना में जातिगत आंकड़े एकत्र नहीं किए जाएंगे। केंद्र ने इसे तकनीकी और प्रशासनिक रूप से जटिल बताते हुए अस्वीकार कर दिया था।
लेकिन इसके बाद भी सीएम नीतीश ने हार नहीं मानी। उन्होंने 2021 में एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इस मुलाकात में सीएम नीतीश ने जोर देकर कहा कि जातिगत जनगणना सामाजिक समानता और विकास के लिए जरूरी है। हालांकि, उस समय केंद्र ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया, लेकिन नीतीश ने इसे राष्ट्रीय मंच पर एक प्रमुख मुद्दा बना दिया।
बिहार में जातिगत जनगणना देश के लिए एक मिसाल
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जब देखा कि केंद्र सरकार उनकी मांग को स्वीकार करने में इच्छुक नहीं है तो उन्होंने बिहार में अपने स्तर पर जातिगत सर्वेक्षण शुरू करने का निर्णय लिया। 1-2 जून 2022 को नीतीश की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक में बिहार में जातिगत जनगणना को मंजूरी दी गई। नीतीश ने इसे सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के रूप में लागू किया जिससे कानूनी और तकनीकी बाधाओं से बचा जा सके।

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बिहार में जातिगत जनगणना (Caste Census) दो चरणों में होनी थी। पहले चरण में ये मकान के जरिए होनी थी। इसके तहत 7 जनवरी 2023 से 31 जनवरी 2023 तक मकानों का नंबरीकरण किया गया और लिस्ट बनाई गई। दूसरे चरण में राज्य के सभी व्यक्तियों की जनगणना का काम 15 अप्रैल 2023 को शुरू किया गया। इसमें जिला स्तर के पदाधिकारियों को भी अलग-अलग कार्य की जिम्मेदारियां दी गई और युद्ध स्तर पर ये कार्य संपन्न हुआ। 5 अगस्त 2023 को सारे आंकड़े बनाकर मोबाइल ऐप के जरिए उसे जमा किया गया। बिहार में कुल सर्वेक्षित परिवारों की कुल संख्या दो करोड़ 83 लाख 44 हजार 107 है और इसमें कुल जनसंख्या 13 करोड़ 7 लाख 25 हजार 10 है। इसमें अस्थाई प्रवासी स्थिति में 53 लाख 72 हजार 22 लोग हैं।
केंद्र का फैसला बनेगा नया अध्याय
30 अप्रैल 2025 यानी बुधवार को हुई मोदी कैबिनेट की बैठक में लिए गए फैसले ने नीतीश कुमार के दशकों लंबे संघर्ष को एक नया आयाम दिया। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने प्रेस क्रान्फ्रेंस में जानकारी दी कि आगामी जनगणना में जातिगत आंकड़े एकत्र किए जाएंगे। यह निर्णय न केवल नीतीश कुमार की मांग को पूरा करता है, बल्कि देश में सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम है। मंत्री अश्वनी वैष्णव ने कहा कि यह फैसला सामाजिक ताने-बाने को ध्यान में रखकर और संवैधानिक व्यवस्थाओं के तहत लिया गया है।

जानिए क्या कहा नीतीश कुमार ने
इस फैसले का स्वागत करते हुए नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए लिखा कि जाति जनगणना कराने का केंद्र सरकार (Central Government) का फैसला स्वागतयोग्य है। यह हमारी पुरानी मांग थी। यह बेहद खुशी की बात है कि केंद्र सरकार ने जीति जनगणना कराने का निर्णय किया है। जाति जनगणना (Caste Census) कराने से विभिन्न वर्गों के लोगों की संख्या का पता चलेगा। जिससे उनके उत्थान और विकास के लिए योजनाएं बनाने में सहूलियत होगी। उन्होंने आगे लिखा कि मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का अभिनंदन करता हूं। आपको बता दें कि सीएम नीतीश ने इसे फैसले को देश के विकास को गति देने वाला कदम बताया।

स्वतंत्रता के बाद, 2011 में यूपीए सरकार ने सामाजिक-आर्थिक और जातिगत सर्वेक्षण (एसईसीसी) किया था, लेकिन इसके आंकड़े तकनीकी कारणों से सार्वजनिक नहीं किए गए। तब से कई राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन जातिगत जनगणना की मांग करते रहे हैं।
जातिगत जनगणना का महत्व इस तथ्य में निहित है कि यह विभिन्न समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को समझने में मदद करेगा। यह आंकड़े नीतियों को अधिक समावेशी बनाने, आरक्षण की सीमा को पुनर्विचार करने, और संसाधनों के समान वितरण में सहायक होंगे। विशेष रूप से, ओबीसी, एससी, और एसटी समुदायों के लिए यह एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है।
जातिगत जनगणना का पूरा इतिहास जानिए
आपको बता दें कि साल 1931 तक भारत में जातिगत जनगणना होती थी। साल 1941 में जनगणना के समय जाति आधारित डेटा जुटाया गया था लेकिन उस डेटा को प्रकाशित नहीं किया गया। साल 1951 से 2011 तक की जनगणना में हर बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का डेटा दिया गया, लेकिन ओबीसी और दूसरी जातियों का डेटा नहीं। इसी बीच साल 1990 में केंद्र की तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग, जिसे आमतौर पर मंडल आयोग के रूप में जाना जाता है, की एक सिफ़ारिश लागू की। ये सिफारिश अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों में सभी स्तर पर 27 प्रतिशत आरक्षण देने की थी। सरकार के इस निर्णय ने भारत, खासकर उत्तर भारत की राजनीति को बदल कर रख दिया।
राजनीति के जानकारों का मानना है कि भारत में ओबीसी आबादी कितनी प्रतिशत है, इसका कोई ठोस प्रमाण अभी मौजूद नहीं है। मंडल कमीशन के आंकड़ों के मुताबिक कह सकते हैं कि भारत में ओबीसी आबादी 52 प्रतिशत है। हालांकि, मंडल कमीशन ने साल 1931 की जनगणना को ही आधार माना था। इसके अलावा अलग-अलग राजनीतिक पार्टियां अपने चुनावी सर्वे और अनुमान के आधार पर इस आंकड़े को कभी थोड़ा कम कभी थोड़ा ज़्यादा करके आंकती आई है।
सीएम नीतीश की सोशल इंजीनियरिंग का कमाल
मोदी सरकार के इस फैसले से जहां राष्ट्रीय राजनीति में सामाजिक न्याय की बहस को बल मिला है, वहीं नीतीश कुमार की छवि एक दूरदर्शी और नीति-निर्माता नेता के रूप में और प्रबल हुई है। यह माना जा रहा है कि जातिगत जनगणना के आंकड़े सामने आने के बाद केंद्र और राज्यों की नीतियों में भारी बदलाव आएंगे। विशेषकर पिछड़े वर्गों और वंचित समुदायों को अधिक समावेशी योजनाओं का लाभ मिलेगा।

केंद्र सरकार द्वारा जातिगत जनगणना को मंजूरी देना सामाजिक न्याय की दिशा में मील का पत्थर है। यह फैसला नीतीश कुमार जैसे नेताओं की लगातार की गई मेहनत और सामाजिक चेतना का परिणाम है। अब जब पूरा देश जातीय आंकड़ों के जरिए अपनी सामाजिक संरचना को जान पाएगा, तब नीतियों का वास्तविक लाभ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त होगा।
बिहार के लोकप्रिय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक बार फिर यह साबित किया है कि वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक सामाजिक सुधारक भी हैं, जो नीतियों की बुनियाद आंकड़ों पर टिका देखना चाहते हैं न कि केवल वोटों पर।

