Chhattisgarh News: धान खरीदी और भंडारण के दौरान सूखत और कीट-जनित नुकसान को लेकर कुछ जगहों पर भ्रम फैलाया जा रहा है। जबकि हकीकत यह है कि धान के भंडारण के समय नमी कम होने से वजन में थोड़ी कमी आना एक स्वाभाविक और वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जो हर साल और हर धान उत्पादक राज्य में होती है।
सूखत कोई नई समस्या नहीं है
सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि खरीफ विपणन वर्ष 2019-20 में 6.32 प्रतिशत और 2020-21 में 4.17 प्रतिशत सूखत दर्ज की गई थी।
इन आंकड़ों से साफ है कि सूखत कोई नई या अचानक पैदा हुई समस्या नहीं है, बल्कि यह वर्षों से चली आ रही सामान्य प्रक्रिया है।
भंडारण के दौरान वजन क्यों घटता है
धान संग्रहण केंद्रों में नमी, तापमान, हवा, भंडारण अवधि और परिवहन के कारण धान में मौजूद नमी धीरे-धीरे कम होती है।
इससे धान का वजन कुछ प्रतिशत घटता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में मॉइस्चर लॉस या ड्रायिंग लॉस कहा जाता है।
इसे पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे नियंत्रित और मापा जरूर जा सकता है।
2024-25 में सूखत सामान्य सीमा में
खरीफ विपणन वर्ष 2024-25 में लगभग 3.49 प्रतिशत सूखत की संभावना जताई गई है।
यह आंकड़ा पिछले वर्षों के औसत के अनुरूप है और किसी भी तरह से असामान्य नहीं माना जाता।
डिजिटल व्यवस्था से सूखत पर पूरी निगरानी
वर्तमान धान खरीदी व्यवस्था में कई आधुनिक व्यवस्थाएं लागू की गई हैं, जैसे—
- डिजिटल स्टॉक एंट्री
- वजन की ऑनलाइन जांच
- गुणवत्ता परीक्षण
- गोदाम और परिवहन ट्रैकिंग
अब सूखत केवल अनुमान नहीं, बल्कि डेटा-आधारित और ट्रैक करने योग्य प्रक्रिया बन गई है।
गड़बड़ी पर तुरंत जांच और कार्रवाई
यदि कहीं सूखत सामान्य सीमा से अधिक पाई जाती है, तो वहां तत्काल जांच की जाती है और जिम्मेदारी तय की जाती है।
इससे यह सुनिश्चित होता है कि धान भंडारण में किसी भी तरह की अनियमितता न हो।
किसानों के हित सर्वोपरि
धान खरीदी व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य है कि किसानों को उनके धान का पूरा और उचित मूल्य मिले।
साथ ही भंडारण प्रक्रिया पारदर्शी, सुरक्षित और भरोसेमंद बनी रहे।
देश की सबसे मजबूत धान खरीदी प्रणालियों में शामिल
आज प्रदेश की धान खरीदी प्रणाली डिजिटल टोकन, ऑनलाइन भुगतान, स्टॉक ट्रैकिंग और शिकायत निवारण प्रणाली के कारण देश की सबसे संगठित व्यवस्थाओं में शामिल है।
इससे किसानों का भरोसा बढ़ा है और पूरी प्रक्रिया में जवाबदेही आई है।
सूखत एक वैज्ञानिक सच्चाई
यह स्पष्ट है कि धान में सूखत भंडारण की एक वैज्ञानिक वास्तविकता है।
अंतर सिर्फ इतना है कि अब इसे पूरी पारदर्शिता, निगरानी और नियंत्रण के साथ संचालित किया जा रहा है, जिससे किसानों और सरकार—दोनों का हित सुरक्षित है।
