Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ में प्राचीन ज्ञान और सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए चलाया जा रहा ‘ज्ञानभारतम्’ राष्ट्रीय पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान अब तेजी से आगे बढ़ रहा है। राज्य के मुख्य सचिव ने सभी जिलों को निर्देश दिया है कि यह महत्वपूर्ण सर्वेक्षण कार्य 31 मई तक हर हाल में पूरा किया जाए। इस निर्देश के बाद प्रशासनिक स्तर पर गतिविधियां तेज हो गई हैं और विभिन्न विभागों को जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से सौंप दी गई हैं।
यह अभियान केवल एक सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि राज्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को बचाने का एक बड़ा प्रयास है। पांडुलिपियां हमारी परंपराओं, ज्ञान और इतिहास की अनमोल धरोहर होती हैं, जिन्हें सुरक्षित रखना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना बेहद जरूरी है।
पांडुलिपियों की खोज और संरक्षण पर विशेष जोर
मुख्य सचिव ने सभी अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि शासकीय संस्थानों, मंदिरों, मठों, पुस्तकालयों, महाविद्यालयों और निजी संस्थानों में सुरक्षित पांडुलिपियों की पहचान और सर्वेक्षण के लिए सक्रिय प्रयास किए जाएं। इसके साथ ही पारंपरिक समुदायों और पुरातात्विक क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण पांडुलिपियां मिलने की संभावना जताई गई है, इसलिए इन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने को कहा गया है।

सरकार का लक्ष्य है कि इन पांडुलिपियों की पहचान, दस्तावेजीकरण, डिजिटलीकरण और संरक्षण एक व्यवस्थित तरीके से किया जाए। डिजिटल रूप में सुरक्षित होने से ये पांडुलिपियां लंबे समय तक सुरक्षित रहेंगी और शोधकर्ताओं व विद्यार्थियों के लिए आसानी से उपलब्ध हो सकेंगी।
‘पांडुलिपि ट्रेजर हंट’ जैसे नवाचार से बढ़ेगी जनभागीदारी
इस अभियान की खास बात यह है कि इसमें आम नागरिकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए नए और रचनात्मक तरीके अपनाए जा रहे हैं। मुख्य सचिव ने “पांडुलिपि ट्रेजर हंट” जैसे कार्यक्रम आयोजित करने का सुझाव दिया है, जिससे लोग उत्साह के साथ इस अभियान से जुड़ सकें।
इस तरह के कार्यक्रमों से लोगों में अपनी सांस्कृतिक धरोहर के प्रति जागरूकता बढ़ेगी और वे अपने आसपास मौजूद पांडुलिपियों की जानकारी प्रशासन को देने के लिए प्रेरित होंगे। इससे छिपी हुई ऐतिहासिक और धार्मिक पांडुलिपियों को खोजने में भी मदद मिलेगी।
हर जिले में बनेगी समिति और मिलेगा प्रशिक्षण
अभियान को प्रभावी बनाने के लिए प्रत्येक जिले में जिला स्तरीय समिति का गठन किया जा रहा है। इसके साथ ही एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाएगा, जो सर्वेक्षण कार्य की निगरानी करेगा। सर्वेक्षण टीमों को विशेष प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, ताकि वे पांडुलिपियों की पहचान और संरक्षण का कार्य सही तरीके से कर सकें।
अधिकारियों ने यह भी कहा कि सर्वेक्षण कार्य के दौरान पांडुलिपियों के स्वामित्व अधिकारों का पूरा सम्मान किया जाएगा और बिना अनुमति किसी भी सामग्री को स्थानांतरित नहीं किया जाएगा। इससे लोगों का भरोसा बढ़ेगा और वे अपनी पांडुलिपियां साझा करने में सहज महसूस करेंगे।

पत्रकारों, साहित्यकारों और शोधकर्ताओं को जोड़ा जाएगा
इस अभियान की सफलता के लिए केवल सरकारी अधिकारियों पर निर्भर रहने के बजाय समाज के विभिन्न वर्गों को भी इसमें शामिल किया जा रहा है। स्थानीय पत्रकारों, साहित्यकारों, इतिहासकारों और जनप्रतिनिधियों को अभियान से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन लोगों के पास स्थानीय इतिहास और परंपराओं की गहरी जानकारी होती है, जिससे दूरदराज के क्षेत्रों में मौजूद महत्वपूर्ण पांडुलिपियों का पता लगाने में मदद मिल सकती है। विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के सहयोग से इस अभियान को और अधिक मजबूत बनाया जा रहा है।
सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने की दिशा में बड़ा कदम
‘ज्ञानभारतम्’ पांडुलिपि सर्वेक्षण अभियान को देश के लिए एक ऐतिहासिक पहल माना जा रहा है। यह अभियान न केवल प्राचीन ग्रंथों और दस्तावेजों को सुरक्षित रखने में मदद करेगा, बल्कि भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा को भी संरक्षित करेगा।
आज के डिजिटल युग में जहां नई तकनीक तेजी से विकसित हो रही है, वहीं हमारी पुरानी पांडुलिपियों को सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है। यह अभियान आने वाली पीढ़ियों को अपने इतिहास और संस्कृति से जोड़ने का एक मजबूत माध्यम बनेगा।
छत्तीसगढ़ में ‘ज्ञानभारतम्’ सर्वेक्षण अभियान को मिली नई रफ्तार यह दर्शाती है कि सरकार अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने के लिए गंभीर है। 31 मई तक सर्वेक्षण पूरा करने का लक्ष्य प्रशासन और समाज दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बन गया है।
यदि सभी विभाग और नागरिक मिलकर इस अभियान में सहयोग करेंगे, तो न केवल पांडुलिपियों का संरक्षण संभव होगा, बल्कि हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा भी सुरक्षित रह सकेगी और भविष्य की पीढ़ियों को इसका लाभ मिलेगा।
