RBI: भारत में जल्द ही 10 और 20 रुपये के नोट नए रूप में दिखाई दे सकते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नोट छापने वाली कंपनी भारतीय रिजर्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL) ने पॉलिमर यानी प्लास्टिक नोट बनाने के लिए जरूरी विशेष शीट खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए कंपनी ने दुनियाभर की कंपनियों से रुचि की अभिव्यक्ति (EOI) मांगी है। इससे साफ संकेत मिलता है कि लंबे समय से रुकी पॉलिमर नोट योजना अब फिर गंभीरता से आगे बढ़ रही है।
क्या होते हैं पॉलिमर यानी प्लास्टिक नोट?
पॉलिमर नोट सामान्य प्लास्टिक से नहीं बनते। इन्हें एक खास मजबूत प्लास्टिक फिल्म पर तैयार किया जाता है, जिस पर सफेद कोटिंग की जाती है ताकि छपाई की जा सके। इन नोटों में पारदर्शी सुरक्षा विंडो होती है, जो इनकी सबसे बड़ी पहचान है। इसी वजह से इनकी नकली कॉपी बनाना बेहद मुश्किल माना जाता है।
सबसे पहले 10 और 20 रुपये के नोट क्यों?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पायलट प्रोजेक्ट शुरू होता है तो सबसे पहले 10 और 20 रुपये के नोट पॉलिमर में जारी किए जाएंगे। इसकी वजह यह है कि इन नोटों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है और ये जल्दी फट जाते हैं या खराब हो जाते हैं। नए नोट ज्यादा समय तक चलेंगे और बार-बार नए नोट छापने की जरूरत भी कम होगी।
अभी फैसला नहीं, लेकिन तैयारी तेज
BRBNMPL द्वारा वैश्विक स्तर पर पॉलिमर शीट खरीदने की प्रक्रिया शुरू होना इस दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि अगले कुछ दिनों में प्लास्टिक के नोट बाजार में आ जाएंगे। 5 जून 2026 को RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी कहा था कि पॉलिमर नोटों का प्रस्ताव अभी विचाराधीन है और इसके फायदे व चुनौतियों का अध्ययन किया जा रहा है।
14 साल पुरानी है यह योजना
भारत में पॉलिमर नोट लाने की चर्चा पहली बार 2009 में शुरू हुई थी। वर्ष 2012 में सरकार ने 10 रुपये के पॉलिमर नोटों के फील्ड ट्रायल को मंजूरी दी थी। 2014 में कोच्चि, मैसूरु, जयपुर, शिमला और भुवनेश्वर में अलग-अलग मौसम में परीक्षण की योजना बनी। 2016 में सामग्री खरीदने की प्रक्रिया भी शुरू हुई, लेकिन तकनीकी और संचालन संबंधी कारणों से यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी।
अब फिर क्यों बढ़ी जरूरत?
देश में डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ा है, लेकिन नकदी का इस्तेमाल भी लगातार बढ़ रहा है। मई 2026 तक देश में चलन में नकदी 42.86 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। वहीं, 2024-25 में करीब 23.8 अरब कटे-फटे और खराब नोट चलन से हटाने पड़े। ऐसे में लंबे समय तक चलने वाले पॉलिमर नोट सरकार और RBI के लिए खर्च कम करने का बेहतर विकल्प बन सकते हैं।
पॉलिमर नोटों के फायदे और चुनौतियां
पॉलिमर नोट कागज के नोटों की तुलना में ढाई से चार गुना ज्यादा टिकाऊ होते हैं। ये पानी से जल्दी खराब नहीं होते, आसानी से फटते नहीं हैं और इन पर गंदगी तथा बैक्टीरिया भी कम टिकते हैं। आधुनिक सुरक्षा फीचर होने के कारण नकली नोट बनाना भी कठिन होता है।
हालांकि इनकी कुछ चुनौतियां भी हैं। शुरुआत में इनकी लागत ज्यादा होती है क्योंकि विशेष सामग्री विदेशों से मंगानी पड़ सकती है। इसके अलावा ATM और नोट गिनने वाली मशीनों को भी नए नोटों के अनुसार अपग्रेड करना होगा। कुछ देशों में लोगों ने यह भी शिकायत की है कि पॉलिमर नोट आपस में चिपक जाते हैं और मोड़ने पर उन पर स्थायी सिलवट पड़ सकती है।
दुनिया के कई देशों में पहले से चल रहे हैं पॉलिमर नोट
ऑस्ट्रेलिया ने सबसे पहले 1988 में पॉलिमर नोट शुरू किए थे। इसके बाद कनाडा, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, मलेशिया, वियतनाम और ब्रुनेई समेत 40 से अधिक देशों ने इन्हें अपनाया। इन देशों का अनुभव बताता है कि शुरुआती लागत अधिक होती है, लेकिन लंबे समय में ये नोट अधिक टिकाऊ और किफायती साबित होते हैं। फिलहाल भारत में भी यह प्रक्रिया शुरुआती चरण में है और यदि सभी परीक्षण सफल रहे तो भविष्य में कागज और पॉलिमर दोनों तरह के नोट कुछ समय तक साथ-साथ चल सकते हैं।
