Chhattisgarh News: रायपुर, 24 जनवरी 2026। रायपुर साहित्य उत्सव के तीसरे और समापन दिवस पर ‘पत्रकारिता और साहित्य’ विषय पर एक विचारोत्तेजक पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। यह सत्र लाला जगदलपुरी मंडप में आयोजित हुआ और दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय बबन प्रसाद मिश्र की स्मृति को समर्पित रहा।
वरिष्ठ पत्रकारों और साहित्यकारों की भागीदारी
इस पैनल चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार सुश्री स्मिता मिश्र, डॉ. हिमांशु द्विवेदी, श्री अवधेश कुमार और श्री गिरीश पंकज शामिल हुए। सत्र का संचालन श्री विभाष झा ने किया।
जनहित और सामाजिक जिम्मेदारी पर जोर
वरिष्ठ पत्रकार श्री गिरीश पंकज ने कहा कि पत्रकारिता हो या साहित्य, दोनों का मूल उद्देश्य जनहित और सामाजिक उत्तरदायित्व होना चाहिए। लेखन का केंद्र आम जनता की समस्याएं और सरोकार होने चाहिए।
पत्रकार और साहित्यकार की भूमिका पर चर्चा
‘हरिभूमि’ के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने कहा कि पत्रकारिता में तथ्यों को निष्पक्ष और संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करना जरूरी है। वहीं साहित्य तथ्यों और परिस्थितियों पर गहराई से विचार करने का अवसर देता है। उन्होंने बताया कि पत्रकार अक्सर संस्थागत सीमाओं में काम करता है, जबकि साहित्यकार को विचारों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने की अधिक आज़ादी होती है।
भाषा और संवेदना दोनों क्षेत्रों की जरूरत
वरिष्ठ पत्रकार सुश्री स्मिता मिश्र ने कहा कि पत्रकारिता और साहित्य में अंतर मुख्य रूप से भाषा, शैली और दृष्टिकोण का होता है। पत्रकारिता तथ्य आधारित होती है, जबकि साहित्य भावनाओं और संवेदनाओं को प्रमुखता देता है। उन्होंने कहा कि संवेदनशील भाषा और सहानुभूति दोनों क्षेत्रों के लिए जरूरी है।
एक ही सिक्के के दो पहलू
पत्रकार और साहित्यकार श्री अवधेश कुमार ने कहा कि पत्रकारिता और साहित्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उन्होंने बताया कि पत्रकारिता के अनुभव अक्सर उनके साहित्य लेखन की प्रेरणा बनते हैं और कई खबरें उन्हें मानवीय विषयों पर लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।
सोशल मीडिया की चुनौतियों पर भी मंथन
सत्र के दौरान श्री विभाष झा ने छत्तीसगढ़ के प्रख्यात पत्रकारों मुक्तिबोध और माधवराव सप्रे के योगदान को याद किया। साथ ही समकालीन पत्रकारिता में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव और उससे जुड़ी चुनौतियों पर भी विस्तार से चर्चा हुई।
पुस्तकों का विमोचन
इस अवसर पर सुश्री स्मृति दुबे के कविता संग्रह ‘करुण प्रकाश’ और श्री लोकनाथ साहू ललकार के कविता संग्रह ‘यह बांसुरी की नहीं बेला है’ का विमोचन भी किया गया।
