बारिश की बूँदों के बीच प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, दिल्ली के सभागार में वैभव वर्धन दुबे से जुड़ी स्मृतियों के बादल भी 9 अक्टूबर की दुपहर उमड़ते-घुमड़ते रहे. कुछ ने इन स्मृतियों को साझा करने की हिम्मत जुटाई, कुछ ने आँखों की पोर तक अटके आंसुओं के ज़रिए इसे अभिव्यक्त किया. यादों का दौर आगे बढ़ा तो भावुक सभागार में कई-कई मौक़ों पर तमाम नम आँखों ने बस एक ही सवाल किया-वैभव, आख़िर इतनी जल्दी भी क्या थी? किसी ने कैंसर जैसी बीमारी से जंग की अपील की, किसी ने परमात्मा से दुआ की, किसी ने अपने दिवंगत साथी से शिकायतें की तो कुछ बस खामोशी से पुरानी यादों में खोए रहे. खचाखच भरे सभागार में सब अपने-अपने हिस्से के वैभव को ढूँढते रहे, उससे बतियाते रहे, उसकी यादें साझा करते रहे. क़रीब सौ से ज़्यादा लोगों के इस जमघट में हर कोई अकेला था और अपने एकांत में कुछ पल वैभव के साथ बिताने की बेचैनी महसूस कर रहा था.
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