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Chhattisgarh News: विष्णु देव साय ने सरहुल महोत्सव में लिया भाग, संस्कृति संरक्षण पर दिया जोर

छत्तीसगढ़
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Chhattisgarh News: छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति अपनी गहरी परंपराओं और प्रकृति से जुड़े जीवन मूल्यों के लिए जानी जाती है। इसी सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है सरहुल उत्सव, जो प्रकृति, समाज और आस्था के अनोखे संगम को दर्शाता है। जशपुर में आयोजित इस वर्ष के सरहुल महोत्सव में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की उपस्थिति ने इस पर्व के महत्व को और भी अधिक उजागर किया।

सरहुल: प्रकृति और जीवन का उत्सव

सरहुल उत्सव उरांव जनजाति का प्रमुख पर्व है, जिसे चैत्र माह में मनाया जाता है। यह पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम है। इस दिन धरती माता और सूर्य देव की पूजा की जाती है और ऋतु परिवर्तन के साथ नए जीवन के आगमन का स्वागत किया जाता है। सरना स्थलों पर सामूहिक पूजा, प्रसाद वितरण और पारंपरिक गीत-संगीत के माध्यम से समाज में एकता और भाईचारे का संदेश फैलता है।

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मुख्यमंत्री की सहभागिता और संदेश

जशपुर के दीपू बगीचा में आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और प्रदेश की खुशहाली, अच्छी वर्षा तथा समृद्ध फसल की कामना की। पारंपरिक रीति के अनुसार बैगा द्वारा उनके कान में सरई (साल) फूल खोंसकर आशीर्वाद दिया गया, जो इस उत्सव की विशेष पहचान है। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि सरहुल उत्सव सदियों से प्रकृति और मानव जीवन के संतुलन का प्रतीक रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जनजातीय संस्कृति की यह धरोहर केवल एक समुदाय की नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है, जिसे सहेजकर रखना बेहद जरूरी है।

संस्कृति के साथ विकास का संदेश

अपने संबोधन में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने राज्य सरकार की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि सरकार तेजी से अपने वादों को पूरा कर रही है और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत लाखों लोगों को घर मिल रहे हैं। महतारी वंदन योजना के माध्यम से महिलाओं को आर्थिक मजबूती दी जा रही है, जबकि किसानों को धान की बेहतर कीमत देकर उनकी आय में वृद्धि की जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के लिए सरकार लगातार ठोस कदम उठा रही है।

उत्सव में झलकी जनजातीय संस्कृति की रंगत

कार्यक्रम के दौरान पूरा वातावरण उत्सव के रंग में रंगा हुआ नजर आया। पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाओं और युवतियों ने सरहुल नृत्य प्रस्तुत किया, जिसने वहां मौजूद लोगों का मन मोह लिया। मांदर की गूंजती धुन और लोकगीतों की मधुरता ने माहौल को जीवंत बना दिया। बड़ी संख्या में लोग इस आयोजन में शामिल हुए और जनजातीय संस्कृति की इस अनूठी झलक का आनंद लिया। सरहुल उत्सव केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और समाज के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का यह संदेश कि इस विरासत को सहेजना हम सभी की जिम्मेदारी है, आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। ऐसे आयोजन न केवल हमारी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम भी करते हैं।