Chhattisgarh News: नकटी अतिक्रमण: संवेदना जरूरी है, लेकिन कानून भी सबके लिए बराबर होना चाहिए

छत्तीसगढ़
Spread the love

Chhattisgarh News: रायपुर के नवा रायपुर स्थित ग्राम नकटी में शासकीय भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई ने पूरे प्रदेश में एक बड़ी बहस छेड़ दी है। बुलडोजर चलते समय रोते-बिलखते परिवारों की तस्वीरें किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर सकती हैं। वर्षों से जिस घर में कोई परिवार रह रहा हो, उसका टूटना निश्चित रूप से पीड़ादायक है। लेकिन इस पूरी घटना का एक दूसरा पक्ष भी है, जिसे समझना उतना ही जरूरी है।

कार्रवाई अचानक नहीं हुई

प्रशासन के अनुसार यह कार्रवाई अचानक नहीं की गई। संबंधित लोगों को लगभग दो वर्षों से लगातार नोटिस दिए जा रहे थे और भूमि खाली करने का अवसर भी दिया गया था। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोगों ने शासकीय भूमि पर कब्जा बनाए रखा।

प्रशासन द्वारा जारी सूची के अनुसार कई लोगों ने छोटे-मोटे हिस्से नहीं, बल्कि हजारों वर्गफुट सरकारी जमीन पर कब्जा किया हुआ था। कुछ मामलों में कब्जे का रकबा 10 हजार, 15 हजार, 20 हजार और लगभग 30 हजार वर्गफुट तक बताया गया है। ऐसे में यह केवल छोटे आवासीय कब्जे का मामला नहीं रह जाता, बल्कि करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी भूमि के निजी उपयोग का गंभीर प्रश्न बन जाता है।

करोड़ों रुपये की सरकारी जमीन पर कब्जे का सवाल

स्थानीय बाजार मूल्य लगभग ₹5,000 प्रति वर्गफुट बताया जाता है। इस हिसाब से यदि किसी ने 29,700 वर्गफुट जमीन पर कब्जा किया था, तो उस भूमि का अनुमानित बाजार मूल्य लगभग ₹14.85 करोड़ बैठता है। इसी तरह कई अन्य कब्जे भी करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी भूमि से जुड़े हो सकते हैं।

जानकारी के अनुसार कुछ लोगों ने जमीन को निजी बताने का दावा भी किया, लेकिन शासन के वर्षों पुराने रिकॉर्ड खंगालने के बाद उनके पूर्वजों का नाम दर्ज नहीं मिला। ऐसे में सरकारी भूमि पर निजी अधिकार का दावा कानून की कसौटी पर कमजोर नजर आता है।

भाटा और चरागाह भूमि का महत्व

पड़ताल के अनुसार यह भूमि सामान्य आवासीय कॉलोनी की नहीं, बल्कि शासकीय भाटा/चरागाह यानी गौचर भूमि बताई जा रही है। ऐसी जमीन का उपयोग नियमानुसार सार्वजनिक हित में स्कूल, अस्पताल, गौशाला या अन्य सामुदायिक निर्माण के लिए किया जा सकता है।

भविष्य में इस जमीन का उपयोग किस उद्देश्य से होगा, यह सरकार का नीतिगत विषय है। यदि वहां विधायकों के आवास बनाने का प्रस्ताव है, तो उस पर अलग राजनीतिक बहस हो सकती है। लेकिन इससे शासकीय भूमि पर किए गए अतिक्रमण की वैधता सिद्ध नहीं हो जाती।

पुनर्वास भी सरकार की जिम्मेदारी

इस पूरे मामले में राहत की बात यह है कि प्रशासन के अनुसार हटाए गए परिवारों को सेक्टर-30, नवा रायपुर में आवास उपलब्ध कराए गए हैं। जिन फ्लैटों को सामान्य परिस्थितियों में हाउसिंग बोर्ड लगभग ₹8 लाख में बेचता है, वही फ्लैट प्रभावित परिवारों को मालिकाना अधिकार के साथ दिए जाने की प्रक्रिया चल रही है।

जिन लोगों के प्रधानमंत्री आवास कार्रवाई में प्रभावित हुए हैं, उनके लिए भी ऐसी ही व्यवस्था बताई जा रही है। हालांकि प्रशासन की जिम्मेदारी केवल मकान देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। प्रभावित परिवारों के रोजगार, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा और पशुधन के लिए भी ठोस व्यवस्था की जानी चाहिए।

मध्यमवर्गीय परिवारों के साथ न्याय का प्रश्न

इस मामले में सबसे बड़ा सवाल न्याय का है। एक मध्यमवर्गीय परिवार रायपुर में 800 या 1000 वर्गफुट का छोटा प्लॉट खरीदने के लिए जीवनभर की कमाई लगा देता है। वह 25 से 35 साल तक बैंक की ईएमआई भरता है, टैक्स देता है, बिजली-पानी के बिल चुकाता है और हर नियम का पालन करता है।

दूसरी ओर यदि कोई व्यक्ति हजारों या दसियों हजार वर्गफुट सरकारी जमीन पर वर्षों तक कब्जा बनाए रखे, तो क्या केवल भावनात्मक आधार पर उस कब्जे को सही ठहराया जा सकता है? यह सवाल समाज को गंभीरता से सोचना होगा।

क्या सभी कब्जाधारी गरीब थे?

इस मामले में यह भी चर्चा रही कि कुछ कब्जाधारियों ने उसी भूमि पर लाखों रुपये के मकान बना लिए थे। कुछ दावों के अनुसार किसी ने जमीन बेचकर लगभग ₹50 लाख का मकान बनाया, जबकि कुछ लोगों के पास पर्याप्त पशुधन और आर्थिक संसाधन भी थे।

यदि ये दावे सही हैं, तो यह प्रश्न और गंभीर हो जाता है कि क्या सभी कब्जाधारियों को केवल गरीब मान लेना उचित है? निश्चित रूप से वहां दिहाड़ी मजदूर और वास्तविक जरूरतमंद परिवार भी रहे होंगे, लेकिन उनके साथ आर्थिक रूप से सक्षम लोग भी शामिल हो सकते हैं। इसलिए पूरे मामले को केवल “गरीब बनाम सरकार” के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं है।

कानून अमीर और गरीब दोनों पर समान हो

हालांकि इस कार्रवाई के साथ एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठता है। समाज में लंबे समय से यह धारणा रही है कि गरीबों के अतिक्रमण पर बुलडोजर जल्दी चलता है, जबकि प्रभावशाली और संपन्न लोगों के अवैध कब्जे वर्षों तक बने रहते हैं।

यदि सरकार वास्तव में कानून का राज स्थापित करना चाहती है, तो उसे यह धारणा भी समाप्त करनी होगी। कार्रवाई गरीब या अमीर देखकर नहीं, बल्कि अवैध कब्जे की प्रकृति देखकर होनी चाहिए। जहां भी करोड़ों की सरकारी जमीन पर प्रभावशाली लोगों का कब्जा है, वहां भी समान कठोरता दिखाई जानी चाहिए।

सामूहिक अतिक्रमण अधिक दिखाई देता है, जबकि प्रभावशाली लोगों के कब्जे अक्सर व्यक्तिगत होते हैं और सुर्खियों में कम आते हैं। लेकिन कानून की नजर में दोनों समान हैं। चाहे गरीब हो या अमीर, नेता हो या व्यापारी, सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा गलत है तो कार्रवाई भी सब पर समान रूप से होनी चाहिए।

सार्वजनिक संपत्ति पर अधिकार किसका?

नकटी की घटना केवल एक गांव की कहानी नहीं है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि सार्वजनिक संपत्ति पर अधिकार आखिर किसका है? यदि सरकारी जमीन पर कब्जे को सही मान लिया जाए, तो फिर वह व्यक्ति जो ईमानदारी से जमीन खरीदता है, टैक्स देता है और पूरी जिंदगी कर्ज चुकाता है, उसके साथ न्याय कैसे होगा?

संवेदना जरूरी है। विस्थापित परिवारों के पुनर्वास की जिम्मेदारी भी शासन की है। लेकिन कानून का पालन भी उतना ही जरूरी है। किसी गलत व्यवस्था को केवल इसलिए सही नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह वर्षों से चली आ रही थी।

राजनीति इस मुद्दे पर अपने-अपने तर्क देती रहेगी, लेकिन समाज को निष्पक्ष होकर सोचना होगा। सरकारी भूमि चाहे किसी गरीब ने घेरी हो या किसी अमीर ने, यदि वह अवैध कब्जा है तो उसे अवैध ही कहा जाना चाहिए। और यदि कार्रवाई हो, तो उसका पैमाना सबके लिए समान होना चाहिए।

यही न्याय का मूल सिद्धांत है।